मेरा तीर्थ- काशी
दीप्त्यर्थ
बोधिका काशी शब्द काशृङ् धातु से अच् एवं गौरादित्वात् ङीष् प्रत्ययादि से
निष्पन्न माना गया है। जिसकी व्युत्पत्ति काशते प्रकाशते शिवत्रिशूलोपरि या सा
अथवा काशयति प्रकाशयतीदं सर्वं या सा काशी अर्थात् जो भगवान् शिव के त्रिशूलोपरि
विराजमान होकर देदिप्यमान है अथवा जो सम्पूर्ण जगत् की प्रकाशिका है वह काशी है। शास्त्रानुसार
स्वनामधन्य तीर्थ विशेष जिसे अविमुक्त, आनन्दवन, आनन्दकानन, अपूनर्भवभूमि एवं महाश्मशानादि
नामों से व्यवहृत किया गया है। काशी का अनादि काल से ज्ञान, अध्यात्म एवं योग
विज्ञान से गहरा सम्बन्ध रहा है। सम्पूर्ण धरागत तीर्थों की गणना में देखें या
आधुनिक परिश्रृंखला में अवलोकन करें येन-केन प्रकारेण काशी का महत्त्व
श्रुति-सारगम्य निजबोध स्वरुप है।महज्जनों की महत्तता का अपूर्व कारण काशी रही है।
राम नाम स्वरूप महावाक्य जिस भगवान् काशी
मरणोपरान्त भगवती अन्नपूर्णा की गोद में उपदिष्ट करके विमुक्त कर देते हैं। यह
महापुरुषों की तपस्थली रही है। नाथयोगी, जैन, बौद्ध, गाणपत्य, शाङ्कर तथा शाक्तादि
सभी के द्वारा सेवित है। शङ्कराचार्य जिसे परमात्म स्वरुपा, निजबोधरूपा,
परमोपशान्ति, साक्षी,सर्वगत अन्तरात्म स्वरूपा काशीपञ्चकम् में बताते हैं। जिसके
विषय में स्कन्दपुराणान्तर्गत काशीखण्ड में वर्णन आया है यथा - परमानन्दरूपाभ्यां
परमानन्दरूपिणि। पञ्चक्रोशपरीमाणे स्वपादतलनिर्मिते।।मुने प्रलयकालेSपि न तत्
क्षेत्रं कदाचन। विमुक्तं न शिवाभ्यां यदविमुक्तं ततो विदुः।। न यदा भूमिवलयं न
यदापां समुद्भवः। तदा विहर्त्तुमिशेन क्षेत्रमेतत् विनिर्मितम्।। एतादृश जो कदापि
शिव एवं शिवा से विमुक्तता रहित है तदर्थ इसका नाम अविमुक्त पडा। जिस काशी का अनेक
सुविस्तृत वैदिक वाङ्मय उपाख्यान काशीगत माहात्म्य स्वरूप में विवेचन करते हैं। यह
महायोगीश्वर का पावन धरा-धाम योगियों के लिये अजिह्मा राजपद्धति स्वरुप माना गया
है। शिव संहिता में विवेचन किया गया है यथा-इडा हि पिङ्गला ख्याता वरणासीति
होच्यते। वाराणसी तयोर्मध्ये विश्वनाथोSत्र भाषितः।। योग के आचार्यों ने शरीरगत
बहत्तर हजार नाडी स्वीकृत किया है। जिसमें से अत्यन्त प्रमुख तीन नाडीयां हैं - इडा,पिङ्गला
एवं सुषुम्णा। कुण्डली मार्गान्वेषी साधक वलयाकाराकारित उत्तुङ्ग शिखर का आरोहण
करता हूआ जब ऊपर पहुंचता है तो उसे वहां इडा जो कि वरुणा नदी स्वरूपा तथा पिङ्गला
असि नदी स्वरूपा में ध्यानगम्य करता हुआ बढता है। इन दोनों के मध्य में वाराणसी
कथित है जहां विश्वनाथ तृतीय लिङ्गाकाराकारित उपहृत होते हैं जो मुक्ति प्रदाता
हैं यथा द्रष्टव्य है- तुरीयं त्रितयं लिङ्गं तदाहं मुक्ति दायकः। इसका बहुत
विस्तृत विवेचन शिव संहिता में किया गया है जिसे समग्र रूप में यहां उद्भावन सम्भव
नहीं है तथापि दिग्दर्शन मात्र यहां कराया गया। काशी सर्वप्रकाशिका सम्पूर्ण
सृष्टि के भूखण्ड से जो विलग है तथा जो महायोगी भूतभावन विश्वनाथ के त्रिशूल पर
समारूढ है।

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