योगेश्वरं हरिं वन्दे वन्दे योगीश्वरं शिवम्
श्रीभगवान् विष्णु या श्रीकृष्ण और भगवान् श्रीशङ्कर योग औऱ योगियों
के परमेश्वर एवं आदि और प्रधान योगाचार्य माने जैते हैं। सारे योग इनसे बनते हैं
और समस्त योगी किसी-न किसी योग से इन्हीं से संयोग प्राप्तकर धन्य होना चाहते हैं।
ये वास्तवमें एक ही हैं। इनके वियोगमें योग और योगमें वियोग है।ये विभिन्न होते
हुए भी एक ही हैं और एक होते हुए भी अनेक हैं।योगके द्वारा इनके स्वरुपको जानकर
इन्हें प्राप्त हो जाना ही परमयोग है। परन्तु यह योग साधन और साध्यरुप में प्राप्त
भी होता है, इन्हींकी कृपा के संयोगसे। ज्ञानतः इनका वियोग ही दुःखमय संसारका योग
है, और
समस्त संसारमें ज्ञानपूर्वक इन्हें देखना ही आनन्दमय स्वरूप का योग है। इस संयोग-वियोग
का रहस्य भी इन्हींकी वाणीसे खुलता है। वे महापुरुष महायोगी भी इस रहस्य को खोल
सकते हैं जो इनके कृपापात्र होकर इन्हें जान चुके और पा चुकें हैं। उपनिषदों में
आता है कि भगवान् श्रीविष्णु और भगवान् श्रीशिव से ही हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी ने योग
प्राप्त किया और उसी योगका विस्तार बादके आचार्यों द्वारा किया गया। अतएव आरम्भमें
इन श्रीहरिहरकी वन्दना करके योगियों के कुछ चरित्र लिखे जाते हैं।
भगवान् हिरण्यगर्भ
योगसूत्रके प्रायः सभी भाष्यकारों तथा वृत्तिकारोंका यह मत है कि पातञ्जल-योगशास्त्र हैरण्यगर्भशास्त्रके आधारपर रचा गया था। इसके समर्थनमें उनका कहना है कि पतञ्जलिने पहला सूत्र – अथ योगानुशासनम् (अब योग का उपदेश दिया जाता है) रखा है, जिससे यह मालूम होता है कि योगसूत्रमें उनका साक्षात् शासन नहीं, वरं अनुशासनमात्र है। फिर महाभारत तथा याज्ञवल्क्यस्मृतिमें एक वचन यह मिलता है-
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः
-हिरण्यगर्भ ही योगके वक्ता हैं, इनसे पुरातन और कोई वक्ता नहीं है। परन्तु यह हिरण्यगर्भ महाराज कौन थे, इसका वर्णन कहीं कुछ नहीं मिलता। महाभारतमें अवश्य ही यह श्लोक मिलता है-
हिरण्यगर्भो द्युतिमान् य एष च्छन्दसि स्तुतः।योगैः सम्पूज्यते नित्यं स च लोके विभुः स्मृतः।।
अर्थात् यह द्युतिमान् हिरण्यगर्भ वही हैं जिनकी वेदमें स्तुति की गयी है। इनकी योगी लोग नित्य पूजा करते हैं और संसारमें इन्हें ही विभु कहते हैं। इससे मालूम होता है योगके आदिप्रवर्त्तक हिरण्यगर्भ महाराज ही हैं अन्य कोई नहीं है, वे साक्षात् परमात्मा ही थे। परब्रह्म परमात्मासे योगसम्बन्धी जो ज्ञान योगाचार्य पतञ्जलि महाराजको प्राप्त हुआ उसीका विस्तार उन्होनें अपने योगसूत्रमें किया। हिरण्यगर्भ श्रीब्रह्माजीका भी नाम है इसलिये किसी-किसीके मत में योग के आदिप्रवर्त्तक श्रीब्रह्माजी ही हैं।
भगवान् दत्तात्रेय महायोगी
एक बार अत्रि मुनिकी सहधर्मिणी पतिव्रताशिरोमणि अनसूयाने यह वरदान मांगा था कि मेरे गर्भसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों जन्म ग्रहण करें। इसीके फलस्वरुप विष्णुभगवान् उनके गर्भसे दत्तात्रेयके नामसे उपन्न हुए। ये बचपनसे ही विरक्त होकर ऋषिकुमारोंके साथ योग-साधनामें लग गये थे। अन्तमें ये एक बहुत बडे सिद्ध योगी हो गये। एक बार देवताओं को जम्भासुरने परास्त कर दिया था। तब बृहस्पतिकी आज्ञासे उन्होनें दत्तात्रेयको प्रसन्न किया और भगवान् दत्तात्रेय की कृपा से राक्षसों का नाश और देवताओंकी विजय हुई। भागवतमें अवधूतके नामसे स्वयं दत्तात्रेयने अपने चौबीस गुरु बतलाये हैं जो इस प्रकार से हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, कबूतर, अजगर, सागर, पतङ्ग, मधुकर, हाथी, मधुहारी, हरिण, मछली, पिङ्गला, वेश्या, गिद्ध, बालक, कुमारी कन्या, बाण बनाने वाला, साँप, मकडी और तितली।
यथा भागवते- पृथिवी
वायुराकाशमापोSग्निश्चन्द्रमा
रविः। कपोतोSजगरःसिन्धुःपतङ्गो
मधुकृद्गजः।।भा.11.7.33
मधुहा हरिणो मीनः पिङ्गला कुररोSर्भकः। कुमारी शरकृत् सर्प ऊर्णनाभिः
सुपेशकृत्।।भा.11.7.34
इन्होंने कितने ही राजाओं और ऋषियोंको
यथार्थ धर्म और योगका उपदेश दिया था। इनके नामपर कितने ही अध्यात्म-शास्त्र
प्रचलित है, जिनमें कुछ के नाम इस प्रकार हैं-
दत्तगीतायोगशास्त्र, अद्भुतगीता,
योगरहस्य, दत्तात्रेयोपनिषद्, दत्तात्रेयगोरक्ष, विद्यागीता इत्यादि।
योगी नारद
देवर्षि नारद का नाम हिन्दू-जनता से छिपा नहीं है। हमारे प्रायः सब धर्मग्रन्थों में इनका कुछ-न-कुछ प्रसङ्ग समाविष्ट है। इनका अस्तित्व प्रत्येक युग में देखा जाता है और सब लोकों में इनका प्रवेश पाया जाता है। जब जहाँ किसी भगवत्कार्य के लिये इनकी आवश्यकता होती है तब तहाँ हम इन्हें उपस्थित पाते हैं। और सबसे बडा आश्चर्य यह है कि केवल दैवकार्य करने पर भी देवता और असुर दोनों के द्वारा समानरूप से ये पूजित होते हैं और दोनों के एक समान विश्वासपात्र बने रहते हैं। इनके दो ही मुख्य कार्य हर समय देखे जाते हैं- भगवद्भक्ति का प्रचार करना और येन-केन प्रकारेण भगवान् की लीला में सहायक होना। यह नवधा भक्तिके बहुत बडे आचार्य माने जाते हैं। यह निरन्तर ईशगुणगान करते हुए तीनों लोकोंमें भ्रमण करते रहते हैं। हिन्दूओं का विश्वास है कि नारदभगवान् आज भी वर्तमान हैं और उसी तरह भक्तिका प्रचार और भगवत्-लीलामें सहायता कर रहे हैं। पूर्वकाल में जिस तरह ध्रुव, प्रह्राद, शुकदेव आदिको इन्होंने दीक्षा और उपदेश दिया था, साधन-पथ में सहायता दी थी, उसी तरह आज भी सच्चे साधकों को दर्शन देकर उन्हें साधन-मार्ग बतलाते हैं। नारद भक्तिसूत्र, नारदपाञ्चरात्र, नारद गीता, नारदस्मृति, नारदीय पुराण आदि इनके कई ग्रन्थ मिलते हैं।
योगी याज्ञवल्क्य
ऋषि पतञ्जलि के अतिरिक्त योगके प्रचारक ऋषि याज्ञवल्क्य भी हुए हैं। इनके जीवनके विषयमें भी कुछ निश्चितरूपसे पता नहीं चलता। यह राजा जनकके दरबारमें रहते थे और पीछे से इन्होंने विद्वत्- सन्यास ले लिया था। गृहस्थाश्रममें इनकी मैत्रेयी और गार्गी नामक दो पत्नियाँ थी। कहते हैं, एक बार मुनिश्रेष्ठ याज्ञवल्क्य के पास बहुत से विद्वान्, तपस्वी, योगमार्गमें निष्ठा रखने वाले, ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण तथा ऋषि आये। सभामें ब्रह्मज्ञानसम्पन्न महाभागा मैत्रेयी और गार्गी भी आ उपस्थित हुईं। तब गार्गीने याज्ञवल्क्य के सामने हाथ जोडकर प्रार्थना की-
भगवन् सर्वशास्त्रज्ञ सर्वभूतहिते रतः। योगतत्त्वं मम ब्रूहि साङ्गोपाङ्गविधानतः।।
हे भगवन्! हे सर्वशास्त्रज्ञ! हे सर्वभूतहितैषिन्! हमारे सामने यथाविधि साङ्गोपाङ्ग योगतत्त्व का वर्णन कीजिये। इस
प्रकार प्रार्थना करने पर योगियाज्ञवल्क्य ने योगशास्त्रका उपदेश किया, जो
योगियाज्ञवल्क्यम् नामसे प्रसिद्ध है। इन्होंने सामश्रवा आदि मुनियों को
वर्णाश्रमधर्म, व्यवहारशास्त्र तथा प्रायश्चित्त आदिका भी उपदेश दिया था। याज्ञवल्क्य-संहिता
के भी प्रवर्त्तक यही माने जाते हैं, इस संहिता में तीन अध्याय और एक हजार बारह
श्लोक हैं। इसमें राजधर्म, व्यवहारविधि और दायभाग आदि विषयों का वर्णन है। इसी
दायभागके आधार पर विज्ञानेश्वर भट्टारकने मिताक्षरा और जीमूतवाहनने दायभाग नामक
ग्रन्थका संकलन किया, जो आज भी भारतवर्ष में कानूनके रूप में माने जाते हैं।
बंगालमें दायभाग और अन्य भागों में मिताक्षरा का आदर है।
राजर्षि जनक
भागवत, महाभारत, हरिवंश, रामायण तथा कयी उपनिषदों औऱ पुराणों में राजा जनकका वर्णन मिलता है। ये इक्ष्वाकुवंशज राजा निमि के पुत्र थे और इनका एक नाम मिथि भी था। इसी से इनके द्वारा स्थापित देशका नाम मिथिला पडा। ये मिथिलाके राजा थे और अपने समयके बहुत बडे योगी थे। ये अपने योगबलसे संसारमें इस तरह निर्लिप्त रहते थे जैसे जलमें पद्मपत्र रहता है। इसीसे ये राजर्षि पद तथा विदेह नामसे भी सुशोभित हुए। जनके केवल योगी ही नहीं, वरं परम ज्ञानी और भगवद्भक्त भी थे। शुकदेव आदि अनेक ऋषियों नें इनसे उपदेश लिया था। जगज्जननी श्रीसीताजी के पिता तथा मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के श्वशुर कहलाने का गौरव इन्हीं को प्राप्त हुआ था। गीतामें भी भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने कहा हे कि राजा जनक आदि निष्काम कर्मयोगके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए।
श्रीशुकदेव मुनि
श्रीशुकदेवजी महाराज भगवान् वेदव्यास के पुत्र थे। इन्होंने देवगुरू बृहस्पति को अपना गुरू बनाया और उनसे वेद-वेदाङ्ग, इतिहास, राजशास्त्र इत्यादिका अध्ययन किया। फिर पिता की आज्ञा से इन्होंने समस्त योगशास्त्रों का अध्ययन किया और राजा जनकके पास जाकर मोक्षप्राप्तिकी साधना सीखी। उसेक बाद हिमालय पर्वत में जाकर कठोर साधना की। ये जन्मसे ही सन्यासी थे। ये एक बहुत बडे ज्ञानयोगी माने जाते हैं। नारदजी ने इन्हें भक्तिमार्ग का उपदेश दिया था। इन्होंने राजा परीक्षित् को शापकालमें श्रीमद्भागवत की पवित्र कथा सनायी थी। ये जीवन्मुक्त और चिरजीवी महापुरुष माने जाते हैं औऱ कहते हैं आज भी साधकों को समय-समय पर दर्शन देकर मुक्तिमार्ग का उपदेश करते हैं।
भक्त प्रह्लाद
भक्त प्रह्लाद असुरराज हिरण्यकशिपुके पुत्र थे। नारदभगवान् की कृपा से गर्भ में ही इनके ह्रदयमें भगवद्भक्तिका बीज पडा था और राज्यकी एक कुम्हारिन के द्वारा उसका विकास हुआ था। हिरण्यकशिपु जहाँ त्रिलोक को अपने वशमें करके ईश्वरत्व का दावा कर रहा था, वहाँ उसी का प्रिय पुत्र उसके शत्रु विष्णु भगवान् का अनन्य उपासक हो रहा था। बालक प्रह्लाद दिन-रात निरन्तर भगवान् के नाम का जप-कीर्तन करते रहते थे और उनसे जो मिलता था, उसे उसी का उपदेश देते थे। हिरण्यकशिपु ने बहुत समझाया, मृत्युका भय दिया, फिर भी प्रह्लाद अपने व्रत से विमुख न हुए। लाचार होकर राजा ने पुत्रको मार डालने की आज्ञा दी, पर्वत पर से गिरवाया, समुद्रमें डुबाया, हाथी के पाँवतले डाल गिया, सर्पों से डसाया, जहर पिलाया, अग्निमें जलाया, फिर भी भक्त प्रह्लाद का एक बाल भी बाँका न हुआ और इन कठोर परीक्षाओं के कारण उनकी भक्ति और भी बढती गयी। अन्त में राजा ने स्वयं उन्हें खम्भे में बाँधकर तलवार से मार डालना चाहा, परन्तु उस समय भक्तभयहारी भगवान् ने नरहरि के रूप में खम्भे में से प्रकट होकर उनकी रक्षा की और असुरराज हिरण्यकशिपु का काम समाप्त किया। उसके बाद प्रह्राद हजारों वर्ष राज्यकर अपनी भक्ति के बल से परमधाम को प्राप्त हुए।
भक्त ध्रुव
प्राचीन काल में मथुरा के राजा उत्तानपाद थे। इनके दो रानियाँ थीं- सुरुचि एवं सुनीति। सुरुचि के प्रेम में पडकर राजा ने सुनीति को वनवास दे दिया। कुछ काल बाद सुरुचि के गर्भ से उत्तम औऱ सुनीति के गर्भ से ध्रुव का जन्म हुआ। पाँच वर्ष की उम्र में एक बार बालक ध्रुव खेलते-खेलते राजा की गोदी में जा बैठा। उसकी विमाता सुरुचि भी वहाँ मौजूद थी। उसने झट ध्रुव को गोदी से नीचे उतार लिया औऱ कहा कि तू इस गोदी का अधिकारी नहीं। जा तपस्या कर और फिर मेरे गर्भ से जन्म ग्रहण कर तब तू इसका अधिकारी होगा। जबतक हीना सुनीति का तू पुत्र है, तबतक तू भी हीन है। विमाता की बात बालक के ह्रदय में तीर की तरह चुभ गयी और वह तुरन्त रोता हुआ माता के पास पहुँचा। माता ने जब सब हाल सुना तो पुत्र को सान्त्वना देते हुए कहा- बेटा सुरूचि ने ठीक ही कहा है। इसमें दुःख मानने की कोई बात नहीं। तपस्या किये बिना कोई ऊचाँ पद नहीं पा सकता। यदि तुम उस गौरवको प्राप्त करना चाहते हो, इस संसार के दुःख-द्वन्दों से छूटकर आनन्दमय जीवन प्राप्त करना चाहते हो तो ईश्वर को प्रसन्न करो।सच्चे ह्रदय से भगवान् की पूजा में लग जाने से वह बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं। माता का उपदेश सुन बालक ध्रुव के आँसू सूख गये और वह उसी क्षण तपस्या के लिये जंगल की ओर चल पडा। पाँच वर्ष के कोमल बालक को बीहड वन में अकेले भटकते हुए नारद भगवान् ने देखा। उन्होंने उससे बातचीत करने पर जब उसकी अपूर्व लगन का परिचय पाया तब उसे मन्त्रसहित भक्तिमार्ग का उपदेश दिया और मधुवन में जाकर तपस्या करने की आज्ञा दी। बालक ध्रुव ने प्रसन्नता और उत्साह के साथ उनकी आज्ञा पालन किया और उनके उपदेशके अनुसार साधना आरम्भ कर दी। ध्रुव ने सारे विघ्न-बाधाओं का सामना करते हुए अनन्य मन से ऐसी कठोर तपस्या की कि भगवान् का आसन डोल ही गया और वह उसके सामने प्रकट हुए बिना नहीं रह सके। हरिको सामने देख ध्रुव चरणों पर गिर गया और भगवान् ने अपना शङ्ख स्पर्श कराकर उसे अपना सारा ज्ञुन प्रदान कर दिया। अन्त में घर जाने की आज्ञा देते हुए यह वरदान दिया कि तुम सब लोकों और ग्रह-नक्षत्रों के ऊपर उनके आधारस्वरूप होकर अचल भाव से स्थित रहोगे और वह स्थआन ध्रुवलो के नाम से प्रसिद्ध होगा। बालक ध्रुव तपस्या पूरी करके घर वापस आया। भगवत् कृपा से माता-पिता का प्रेम और राज्याधिकार उसे प्राप्त हुआ। प्रायः छत्तीय हजार वर्ष राज्य करने के बाद ध्रुव अन्त में उस भगवत्प्रदत्त लोक को प्राप्त हुए।
योगाचार्य पतञ्जलि
योगाचार्य महर्षि पतञ्जलि कौन थे और कब हुए, इस विषयमें कुछ भी निश्चितरूप से पता नहीं चलता। भिन्न-भिन्न शास्त्रों और पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार के वर्णन मिलते हैं। किसी-किसीका यह भी मत है कि पातञ्जलि स्वयं शेष भगवान् या अनन्त देव हैं। अस्तु पतञ्जलि ने सांख्यमतका समर्थन करके उसे प्रत्यक्षमूलक सेश्वरदर्शनमें परिणत करनेके लिये सांख्यप्रवचनयोगसूत्र के नामसे अपना मत प्रस्थापित किया। उन्होंने अपने पूर्ववर्त्ती योगियोंके मतका विशद रूप में और नये ढंग से प्रचार किया औऱ इस कारण उनका मत पातञ्जलदर्शन के नामसे प्रसिद्ध हुआ। इस दर्शन के ऊपर अनेक भाष्य और अनेक वृत्तियाँ रची गयी हैं।
किसी-किसी का मत है कि इन्हीं ऋषि पतञ्जलिने पाणिनीय व्याकरणका महाभाष्य तथा वैद्यकका चरकसंहिता ग्रन्थ रचा था। ये दोनों ग्रन्थ अपने-अपने विषयके अद्वितीय हैं। इसीसे कहा जाता है-
योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योSपाकरोत्तं प्रवरं मुनिनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोSस्मि।।
योगी भर्तृहरि
ये उज्जैन के प्रसिद्ध राजा महाराज विक्रमादित्य के सौतेले भाई थे। पहले यही उज्जैन के राजा थे। एक समय विक्रमादित्य नाराज होकर घर से निकल गये थे। इधर पीछे से भर्तृहरि ने अपनी रानी की दुश्चरित्रता की बातें देखीं, तब इन्हें संसार के भोगों से वैराग्य हो गया। कहते हैं, इन्होंने काशी में आकर गुरु गोरक्षनाथ जी से सन्यास की दीक्षा ली और आगे चलकर महान् सिद्ध योगी हुए। इनके श्रृङ्गारशतक, नीतिशतक एवं वैराग्यशतक नामक सौ-सौ श्लोकों के तीन ग्रन्थ अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। ऐसा ही एक विज्ञानशतक भी लिखा है। पहले तीन ग्रन्थों का अनुवाद फ्रेंच, लैटिन, जर्मन और अँग्रेजी भाषा में भी हो चुका है। व्याकरण के भी आप बडे पण्डित थे। इनका वाक्यपदीयम् और हरिकारिकासूत्र प्रसिद्ध है। महाभाष्यदीपिका और महाभाष्यत्रिपदीव्याख्या नामक दो ग्रन्थ आपके और बलनाये जाते हैं। कोई-कोई इन्हें योगबल से अमर मानते हैं।
भगवत्पाद जगद्गुरु शङ्कराचार्य
अद्वैतमत के प्रवर्तक जगद्गुरु भगवान् श्रीशङ्कराचार्य का नाम आज दिन किसी से छिपा नहीं है। आप केरल प्रदेश के कलादी नामक गाँव में एक वेदशास्त्रपारङ्गत धर्मनिष्ठ ब्राह्मण के घर में अवतीर्ण हुए थे। आप साक्षात् देवाधिदेव महादेव के अवतार माने जाते हैं। आपके जीवन की अलौकिकता को देखते हुए इस बात में कोई सन्देह भी नहीं रह जाता है। आप एक वर्ष की उम्र में ही अपनी मातृभाषा में बातचीत करने लगे, दो वर्ष की आयु में ही माताद्वारा कथित पुराण-कथाओं को कण्ठस्थ करने लगे। पाँच वर्ष की आयु में उपनयन-संस्कार करके आपको गुरु के पास अध्ययनार्थ भेद दिया गया और दो वर्षमें ही षडङ्गसहित वेदका अध्ययन कर आप प्रकाण्ड पण्डित हो गये। इसी समय इन्होने सन्यास लेके का विचार किया और माता से आज्ञा माँगी, परन्तु माता ने आज्ञा नहीं दी। आखिर एक दिन माता के साथ स्नान करने गये और पानी में डूबने लगे। आपने माता से कहा कि यदि तुम सन्यासी होने की आज्ञा दे दो तो शायद मैं बच सकता हूँ। माता ने पुत्र की आकस्मिक मृत्यु के भय से आज्ञा दे दी। बस आप उसी समय माता से विदा ले श्रीगोविन्दस्वामी के पास आये और दीक्षा ले ली।
कुछ दिनों तक श्रीगुरुदेव की सेवा में रहकर आपने साधना की। एक दिन गुरुदेव जब समाधिमें थे, तब बडे जोरकी वर्षा हुई, जिससे सारा आश्रम पानी से घिर गया। श्रीशङ्कर ने अपने कमण्डल में सारे पानी को रोक लिया, जिसमें आश्रम को कोई हानि न हो और न गुरुदेव को कष्ट हो। जब गुरुदेव की समाधि भङ्ग हुई और उन्होंने आपकी यौगिक सिद्धि देखी तो बडे प्रसन्न हुए और काशी जाकर ब्रह्मसूत्र की टीका करने की आज्ञा दी। तदनुसार श्रीशङ्कर काशी आये और ब्रह्मसूत्रपर भाष्य की रचना की। कहते हैं, विश्वेश्वर विश्वनाथ साक्षात् चाण्डालरूप में आपके सामने प्रकट हुए और आपसे वाद-विवाद किया। चाण्डाल के शास्त्रार्थ से चकित होकर आपने आत्मदृष्टि से विचार किया और साक्षात् भगवान् को सामने देख वन्दना की। भगवान् शङ्कर प्रसन्न होकर धर्मप्रचार करने की आज्ञा दी। इसी तरह वेदव्यासने आपके सामने प्रकट होकर आपसे शास्त्रार्थ किया, पीछे जब आपने पहचानकर उनका स्तवन किया तब व्यासजी ने अद्वैतवाद का प्रचार करनेकी आज्ञा दी और आपकी आयु 16 वर्ष से 32 वर्ष होने का वरदान दिया।
तत्पश्चात् काशी में अपने विरोधियों को हराकर आपने सारे भारत का भ्रमण किया और सर्वत्र सनातनधर्मका प्रचारकर चोरों कोनों में चार विभिन्नन मठ स्थापित करके अपने चार प्रधान शिष्यों को धर्म प्रचार के लिये जगद्गुरु के पदपर बैठाया। एक बदरिकाश्रम को छोडकर बाकी तीन मठ आज भी वर्तमान हैं। आपने ब्रह्मसूत्र, दशोपनिषद् तथा गीता पर अपूर्व भाष्य लिखे तथा अन्य कितने ही ग्रन्थ और स्तोत्र रचे, जिनसे आज भी मनुष्यजातिका महान् कल्याण हो रहा है। परकायप्रवेश, भविष्यकी बात जान लेना आदि कितनी ही योगसम्बन्धी सिद्धियाँ भी आप में देखी गयीं। आपकी भगवद्भक्ति तो अपूर्व थी ही, जिसका प्रमाण आपके स्तोत्र दे रहे हैं। आपने अपनी भक्ति के बलरपर एक दरिद्र ब्राह्मणको धन-जन सम्पन्न किया था, केरलके राजा राजशेखरको पुत्र की प्राप्ति करायी थी तथा अपनी वृद्धा माता को उनकी इच्छा के अनुरूप विष्णुलोक की प्राप्ति करायी थी। इस तरह के अनेक चमत्कार दिखाये थे। इस तरह धर्मप्रचार और लोक-कल्याण में अपना जीवन व्यतीत कर आपने 32 वर्ष की उम्र में श्रीकेदारनाथ पर्वत के समीप अपनी इह लीला समाप्त की। श्रीशङ्कराचार्य के कालके सम्बन्ध में बहुत मतभेद है, प्रोफेसर विल्सन ने लिखा है कि शङ्कराचार्य ईसा की आठवीं या नवीं शताब्दी में हुए। श्रीयुत पाठक आदि अन्वेषकों ने सातवीं शताब्दी बतलाया है परन्तु मठों की परम्परा देखने पर यह निश्चय होता है कि शङ्कर का काल ईसा से लगभग चार शताब्दी पूर्व था। उनका जन्मदिन युधिष्ठिर-संवत् 2631 वैशाख शुक्ल 5 माना जाता है, जिसको अब 2404 वर्ष हो जाते हैं। पीछे के कुछ विशिष्ट विद्वानों का भी लगभग ऐसा ही मत है।
श्रीश्रीरामानुजाचार्य
जगद्गुरु श्रीसम्प्रदायाचार्य श्रीश्रीरामानुजाचार्य का जन्म दक्षिण भारत के कर्नाटकप्रदेश के भूतपुरी नामक गाँव में वेदशास्त्रविशारद धर्मपारायण महात्मा केशव सोमयाजी नामक ब्राह्मण के घर में हुआ था। कहते हैं, माता-पिता के सन्तान के लिये भजन-पूजन करने पर सन्तुष्ट होकर स्वयं शेषभगवान् ने श्रीरामानुज के रूप में अवतार लिया था। श्रीरामानुज ने पाँच वर्ष की उम्र में उपनयन-संस्कार होने के बाद अपने पिता से ही विद्या पढना आरम्भ किया। सोलह वर्ष की आयु में आपका विवाह कर दिया गया और उसके बाद आप यादवप्रकाश नामक सन्याशी से पढने लगे। आपकी प्रतिभा अलौकिक थी। आपको विद्या पढने में बहुत समय नहीं लगा। आगे भी आप जिन गुरुओं के पास गये, आपकी प्रतिभा देखकर उनकी ऐसी कृपा हुई कि आपकी विद्या स्वयं बढती गई। एक दिन वेदान्क की व्याख्या करते समय यादवप्रकाश के साथ आपका वाद-विवाद हो गया, जिससे यादवप्रकाश कुछ नाराज हो गये। फिर कुछ दिनों बाद आपने एक शब्द की व्याख्या गलत करते देख गुरु से वास्तविक अर्थ निवेदन कर दिया। इसपर यादव ने कहा कि तुम तो पारङ्गत हो गये , मुझसे पढने की अब तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं।
गुरु की आज्ञा से आपने पढना बन्द कर दिया, पर उनके पास आना-जाना जारी रहा। यादव के मनमें पहले से जो द्वेष हो गया था, उसके कारण उन्होंने आपको एक समय जंगल से होकर जाते समय मरवा डालना चाहा। परन्तु यह बात आपको मालूम हो गयी औऐर आप साथ छोडजकर लौट आये। उस समय स्वयं भगवान् श्रीवरदराज और जगज्जननी श्रीलक्ष्मीजी ने भील-भीलनी का रूप धारणकर आपको काञ्चीपुरी पहुँचा दिया।
इन्हीं दिनों स्वामी यामुनाचार्य जी ने अपने शिष्य श्रीमहापूर्ण स्वामी को आपको बुलाने के लिये भेजा, परन्तु आपके पहुँचते-पहुँचते श्रीयामुनाचार्य का देहावसान हो गया। कहते हैं, यामुनाचार्य जी के हाथ की तीन अँगुलियाँ मुड गयी थां. इसे देखकर आप उसका मतलब ताढ गये और आपने तीन प्रतिज्ञाएँ कीं कि1. मै श्रीवैष्णवसम्प्रदाय में रहकर उसका प्रचार और रक्षा करूँगा, 2. ब्रह्मसूत्र पर श्रीभाष्य रचूँगा तथा 3. पुराणों के गूढार्थ को समढाने के लिये अभिधान बनाऊँगा। यह कहते ही उनकी अँगुलियाँ पूर्ववत् हो गयीं।
तदनन्तर श्रीरामानुज ने भगवान् वरदराज की आज्ञा के अनुसा र श्रीमहापूर्ण स्वामी को गुरु बनाया और उनसे वेदान्तसूत्र तथा अन्यान्य बहुत-सी चीजें पढीं। उसके बाद आपने सन्यास ले लिया और आपका नाम यतिराज पडा। इन्हीं दिनों श्रीगोष्ठी पूर्ण स्वामी ने आपको एक मन्त्र दिया और साथ ही आदेश कर दिया कि इस कल्याणकारी मन्त्र का उपदेश किसी को कभी मत देना। परन्तु लोककल्याण की दृष्टि से आपने खूले आम सबको वह मन्त्र बता दिया। जब श्रीगोष्ठी स्वामी ने इस आज्ञा को तोडने का कारण पूछा तो आपने कहा कि गुरु-आज्ञा भंग करने के कारण में भले ही नरक में पडूँ आपकी कृपा से और सब लोक तो परमपद प्राप्त अवश्य करेंगे। यह उदारता देखकर श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामी अत्यन्त प्रसन्न हुए।
कई गुरुओं से वेद-शास्त्र का अध्ययन तथा भक्तिमार्ग का साधन कर लेने के बाद श्रीरामानुजाचार्य धर्मप्रचार में संलग्न हुए। आपने कन्याकुमारी से हिमालय तक औऱ अटकसे कटकतक कई बार यात्राएं कीं और भगवद्भक्ति का सर्वत्र प्रचार किया। आपने भारत के प्रधान-प्रधान तीर्थस्थानों में अपने मठ स्थापित करके अपने शिष्यों को नियुक्त किया, जिसमें उनके द्वारा बराबर भक्ति गङ्गा देश में प्रवाहित होती रहे। साथ ही आपने वेदान्त-सूत्रपर श्रीभाष्य, वेदान्तप्रदीप, वेदान्तसार, वेदान्तसंग्रह, गीताभाष्य आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। एक समय आपको मालूम हुआ कि दिल्लीपति के घर में रामप्रिय नामक नारायणकी मूर्ति है। आप तत्काल वहाँ पहुँचे और फिर अपने भक्तिभरे अन्तः करण से आपने उस मूर्त्ति को स्मरण करके अपने पास बुलाया। कहते हैं, सबके देखते-देखते वह मूर्ति आपके पास आई उपस्थित हुई। आपने उस मूर्तिकी स्थापना बडे उत्सव के साथ की औऱ उसकी बराबर पूजा करते रहे।
इस तरह 120 वर्ष की आय़ु पूरी होने तक आपने लोक-कल्याणकारी कार्य करते हुए माघ सुदी 10 सं.1184 को श्रीरंङ्गपुरी में इहलीला संवरण की।
श्रीश्रीवल्लभाचार्य
श्रीश्रीवल्लभाचार्य का जन्म तैलंगप्रदेश के आम्बलि (वर्तमान अरैल) नामक गाँव में लक्ष्मण भट्ट नामक एक विद्वान् और धार्मिक ब्राह्मण के घर में संवत् 1535 में हुआ था। इनके माता-पिता देश छोडकर तीर्थयात्रा के लिये काशी आये और फिर कुछ दिन वहाँ रहकर मथुरा में पास यमुना के उस पार गोकुलमें जा बसे। बाल्यावस्था में वल्लभाचार्य की बुद्धि बडी प्रखर थी। फलस्वरूप आप थोडे ही दिनों में विभिन्न शास्त्रों के प्रकाण्ड पण्डित हो गये। कहते हैं , चार मास में आपने संस्कृत-साहित्य और दर्शनशास्त्र का पूर्णरूप से ज्ञान प्राप्त कर लिया था।
ग्यारह वर्ष की उम्रमें आपके पिता स्वर्गवासी हुए। इससे आपके मन में बडी उदासी हुईज्ञ और आप भगवद्भक्ति की ओर झुके। साथ ही किसी कल्याणकारी नवीन धर्ममत की स्थापना करने की भी आकांक्षा आपके ह्रदय में जागृत हो उठी। कहते हैं, वृन्दावन में आपकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आपके सम्मुख प्रट हुए और बालगोपाल-स्वरूप की उपासना करने की आज्ञा देते हुए उपासना की विधि भी बतलायी। तब आपने बाल-गोपालकी हू उपासना आरम्भ कर दी औऐर उसी का प्रचार अपने सम्प्रदाय में किया।
आपने छः वर्ष के भीतर प्रायः तीन बार समस्त भारत का भ्रमण किया, अपने विरोधी मतवादियों को शास्त्रार्थ में हराया और अपने मत का प्रचार किया। पहले-पहल आपको अपनी आदि मातृभूमि तैलङ्गदेश में जाना पडा था। उसी यात्रा में विजयनगर के राजा कृष्णराय की सभा में आपने पण्डितो को शास्त्रार्थ में टराकर राजा को अपना शष्य बनाय और यहीं पर आपको आचार्यपद प्राप्त हुआई। दिग्विजय करने के बाद आप पभी गोकुलमें और कभी काशी में रहते थे। काशी में रहते समय आपने श्रीमद्भागवतपर सुबोधिनी टीका, व्याससूत्र पर भाष्य, गीतापर टीका तथा अन्यान्य अनेक ग्रन्थों की रचना की। आपने कुछ दिन उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तटपर एक पीपल के पेडके नीचे निवास किया था, जो स्थान आज भी महाप्रभुकी बैठकके नामसे पर्सिद्ध है। चुनारसे एक कोस पूर्व आपके नामपर एक मठ और मन्दिर है और उसके आँगनमें जो कुआँ है , वह आचार्यकुआर् कहलाता है। और भी कई बैठकें आपकी प्रसिद्ध हैं।
आप अन्तसमयमें काशीमें ही आ गये थे और यहींपर आप संवत् 1587 में श्रीकृष्णस्वरूपमें लीन हो गये। कहते हैं, आप हनुमानघाट पर स्नान करने गये गोता लगाते ही अदृश्य हो गये। कुछ क्षण बाद ही एक उज्ज्वल प्रकाश वहाँ प्रकट हुआ और उसमें लोनों देखा किदिव्य शरीर धारणकर आप ऊर्ध्वलोकमें गमन कर रहे हैं। आपके सम्प्रदायके लोग विशेषकर गुजरात, मारवाड, मथुरा और वृन्दावनमें पाये जाते हैं।
श्रीश्रीनिम्बार्काचार्य
श्रीश्रीनिम्बार्काचार्य वैष्णवसम्प्रदायकी निमात्-शाखा अथवा द्वैताद्वैत-मतके प्रवर्त्तक थे। आपके पिताका नाम जगन्नाथ था और आप वृनदावन के समीप ध्रुव पहाडपर रहते थे। यहाँपर आपकी गद्दी स्थापित है। बचपनमें आपका नाम भास्कराचार्य था। आप अपने समके एक विख्यात विद्वान् और साधु पुरुष थे. आप श्रकृष्णभगवानके अनन्य भक्त थे। आपके सिद्धपुरुष होने का प्रमाण एक कथा में मिलता है। कहते हैं एक समय एक जैन सन्यासी आपके पास आये और दनों आदमियोंमें बहुत देरतक शास्त्र-विचार होता रहा। अब सूर्यास्त होने लगा और भास्कराचार्यने अपने तपोबलसे सूर्यकी गति तबतक रोक रखी जबतक रसोई न बन गयी और उन महात्माने भोजन न कर लिया। उस समय सूर्यदेव आपकी प्रार्थना से सन्तुष्ट होकर एक निम्बवृक्षपर छिपे रहे। इशी कारण आपका नाम तबसे निम्बार्क या निम्बादित्य पड गया। आपके रचे हुए भी कई ग्रन्थ मिलते हैं। आपका आविर्भावकाल आजतक के अन्वेषक 12वीं शताब्दी मानते हैं। परन्तु भक्तों का विश्वास है कि आपका प्राकट्य द्वापरके अन्तमें हुआ था।
श्रीश्रीमध्वाचार्य
वैष्णव-सम्प्रदायकी माध्व-शाखाके प्रवर्त्तक श्रीश्रीमध्यवचार्य जी का जन्म दक्षिण भारतके तुलुव नामक स्थानमें हुआ था। आपके पिता का नाम मधिजी भट्ट था। पहले आपकी नाम वसुदेवाचार्य था। आपने नौ वर्षकी उम्रमें दीक्षा ली और तभीसे आपमें वैराग्यका प्रादुर्भाव हो गया। विद्याभ्यास पूरा होने तथा भक्तिसाधनमें पारङ्गत होनेपर आईपने गीताभाष्की रचना की और बदरिकाश्रम गये। कहते हैं, वहाँ आईपने अपनी पुस्तक श्रीव्यासदेवको उपहाररूपमें दी और व्यासदेवने भी आपको तीन शालग्राम-शिलाएं प्रदान कीं। उन तीनों शिलाओं की प्रतिष्ठा आपने बडे आदरके साथ सुब्रह्मण्य, उदिपि और मध्यतलके मन्दिरों में की। उदिपि में आपने एक श्रीकृष्णमूर्तितिकी भी स्थापना कीथी। तहते हैं, वह मरूत्ति कहीं जलमें डूबी पडी थी और उसका पता आपको दिव्य दृष्टिसे लगा। फर उसे निकालकर आपने स्थापना की। तभी से उदिपि माध्व-सम्प्रदायका प्रधान तीर्थ समझा जाने लगा।
श्रीमध्वाचार्य जी ने उदिपिमें कुछ समय रहकर मूल और भाष्य सब मिलाकर प्राय75 से भी ऊपर ग्रन्थों की रचना की। उसके बाद आप दिग्विजयके लिये निकले। विभिन्न स्थानों में भ्रमणकर आपने विद्वान् पण्डितों तथा अन्य सम्प्रदायके आचार्यों से शास्त्रार्थ किया और अपने मतका प्रचार किया। अन्में आप बदरिकाश्रम आये और यहीं 1199 ई. में आपने अपनी इहलीलासंवरण कीय़
श्रीमध्वाचार्य जी के पाण्डित्यपर मुग्ध होकर थोडे ही दिनों में आपके अनेक शिष्य हो गये। आपने अपने मतके प्रचारके लिये उदिपिके अतिरिक्त और आट मन्दिरों की स्थापना की और अपने शिष्यों को वहाँ बैठाया। आपने विष्णुकी भक्ति करने का उपदेश दिया था।
स्वामी श्रीरामानन्दजी
स्वामी श्रीरामानन्दजी का जन्म प्रयागराज में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मणके घर सन् 1300 ई. के प्रारम्भ में हुआ था। पहले यह रामानुज-सम्प्रदाय के वैष्णव थे। एक बार यह तीर्थयात्रा करने गये। विभिन्न स्थानों में भ्रमणकर जब यह अपने मठपर वापस आये तो इनके सम्प्रदायके अन्य वैष्णवोंने कहा कि दूसरेके सामने भोजन करना रामानुज-सम्प्रदायकी रीतिके विरद्ध है। तीर्थयात्रामें तुमने इस नियमका पालन नहीं किया होगा, अतएव हमलोग तुम्हारे साथ भोजन नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार बहिष्कृत होने से इन्हें बडा दुःख हुआ और यह उसी समय काशी चले आये। इनके लिये शिष्योंने एक मठ बना दिया, जिसे पीछे किसी मुसलमान राजाने नष्ट कर दिया। उस स्थानपर एक वेदीभर रह गयी है, जिसपर स्वामी रामानन्दका पदचिह्न अङ्कित है।
यह श्रीरामचन्द्र जी के अनन्य उपासक थे और उन्हींकी भक्तिका उपदेश दिया करते थे। यह एक सिद्ध भक्त थे। इनके अनेक शिष्य हो गये और पीछ इनका स्वतन्त्र सम्प्रदाय ही चल पडा, जो रामानन्दी या रामात् सम्प्रदायके नामसे विख्यात हुआ। यह सब जातिके लोगोंको उपदेश देते थे। परन्तु वर्णाश्रमकी मर्यादोको भी मानते थे। अनन्दानन्द, कबीर, नरहरि, रैदास, करमचन्द आदि इनके प्रधान शिष्य थे। युक्तप्रान्तमें आज भी इस सम्प्रदायके हजारों मनुष्य मिलते हैं।
श्रीरामानन्दजी बडे पराक्रमी और शास्त्रमर्मज्ञ भी थे। इन्होंने जैनियों, मुसलमानों तथा अद्वैतवादियोंके साथ कई स्थानोंमें शास्त्रार्थ किया था।
श्रीमत्स्येन्द्रनाथ
हठयोग के आदिप्रवर्त्तक अबवान आदिनाथ श्रीशङ्कर माने जाते हैं। इनके दो प्रधान शिष्य हुए- मत्स्येन्द्रनाथ एवं जालन्धरनाथ । कहते हैं , भगवान शंकर जब श्रीपार्वतीजी को योगविद्या समझा रह थ तब वब सनते-सुनते समाधिस्थ हो गयीं। जब विष्णुभगवान् मस्त्यके उदरमें प्रवेशकर श्रीपार्वतीजी की जगह हुँकारी भरने लगे, जिसमें श्रीश्करभगवान् योगविषयक चर्चा बन्द न कर दें। श्रीशङ्करभगवान्का ध्यान जब इस ओर गया तब विष्णुभगवान बालकरूपमें सामने प्रकट हो गये। कहते हैं, यही मत्स्येन्द्रनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए। स्कन्दपुराण तथा बृहन्नारदपुराणमें इनकी उत्पत्ति के विषय में दूसरी ही कथा लिखी है। उसके अनुसा र एक मछलीने एक बालकको, जिसे अशुभ नक्षत्रमें उत्पन्न् होनेके कारण माँ-बापने फेंक दिया था, निगल लिया। फिर शिव-पार्वतीका संवाद सुनकर वह बालक आदेश आदेश चिल्ला पडा। माता पार्वतीने उस बालकको उठा लिया और मत्स्येन्द्रनाथ नाम रखा। शङ्करभगवान् से योगविद्या सीखकर उन्होंने फिर सेसारमें इसका प्रचार किया। इन्हींको मछिंदर या मछंदरनाथ कहते हैं।
मत्स्येनाद्र-संहिता नामक एक योगविषयक ग्रन्थ इनका मिलात है। इनके मुख्य शिष्य श्रीगोरक्षनाथ जी हुए। कहते हैं, एक बार नेपालके राजा श्रीवसन्तदेवजी राज्यच्युत होकर श्रीगुरु मत्स्येन्द्रना थजी की शरणमें आये। श्रीगुरु के आशीर्वादसे उन्हें पुरमः राज्य की प्राप्ति हुई और उन्होंने श्रीमत्सेयन्द्रना थजी क शिवस्वरूप मानकर उनके मन्दिरकी स्थापना की और नेपालके घर-घरमें उनकी पूजाका प्रचार किया। नेपाल के भोगमती नामक गाँवमें श्रीमत्स्येन्द्रनाथ का प्रधान धाम है, जहां प्रतिवर्ष वैशाखमें तीन दिनतक उत्सव मनाया जाता है। श्रीमत्स्येन्द्रनाथ की सवारी बडी सज-धजके साथ निकाली जाती है।
श्रीजालन्धरनाथ
कहते हैं , शिव-पार्वतीने एक बार एक शिशुको समुद्र्में बहते हुए देखा
और उसे उठा लिया। श्रीशिवजीने कृकर उसे योगकी दीक्षा दी और वही बालक जालन्धरनाथके
नामसे विख्यात हुआ। ये बडे ही सिद्ध महात्मा हुए। कहते हैं, राजा गोपीचन्दने एक बार
रंज होकर कुआँ खोदवाकर उसमें इन्हें डाल दिया और ऊपरसे मिट्टी और लीद भरवा दी।
बरसों बाद जब इनके शिष्यके आने पर गोपीचन्दने इनेहें बाहर निकलवाया तब यह पहलेसे
भई सतेज होकर निकले। मिट्टी और लीदका शरीरमें कहीं स्पर्श भी नहीं हआ था। इनके
सम्प्रदायमें गोपीचन्द, भर्तृहरि आदि कितने ही योगी तथा मैनावती(गोपीचन्दकी माता),
लीलावती आदि अनेकों योगिनियाँ हो गयी हैं।
योगिराज श्रीगोरखनाथ
एक बार गुरु मत्स्येन्द्रनाथ घुमते-फिरते अय़ोध्याके पास जयश्री नामक नगरमें गये। वहाँ वह भिक्षा माँगते हुए एक ब्राहह्मणके घर पहुँचे। ब्राह्मणीने बडे आदरके साथ उनकी छझोलीमें भिक्षा डाल दी, ब्राह्मणीके मुखपर पातिब्रतका अपूर्व तेज था। उसे देखकर मत्स्तयेनद्रनाथ को बडी प्रसन्नता हुई। परन्तु साथ ही उन्हें उस सतीके चेहरेपर उदासीकी भी एक क्षण रेखा दिखायी पडी। जब उन्होंने इसका कारण पूछा तो उस सतीने निस्संकोचभावसे उत्तर दिया किसन्तान नहोने से संसारफीका जान पडता है। मत्स्येन्द्रनाथने तुरम्त झोलीसे थोडी-सी भभूत निकाली और ब्राह्मणीके हाथपर उसे रखते हुए कहा, इशे खा लो, तुम्हें पुत्र प्रापत होगा। इतना कह वे तो वहाँ से चले गये। इधर ब्राह्मणीकी एक पडोसिन स्त्रीने जब यह बात सुनी तो उसने कऊ तरहके डर गिखाकर उसे भभूत खानेसे मने कर दिया। फलस्वरूप उसने भभूत एक गड्ढेमें फेंक दी। बारह वर्ष बाद मत्स्येन्द्रनाथ उधर पुन) वापस आये और उन्होंने उस घरके द्वारपर जाकर अलख जगाया। ब्राह्मणीके बाहर आनेपर उन्होंने कहा कि अब तो तेरा बेटा बारह वर्ष का हो गया होगा, देखूँ तो, वह कहाँ हैं यह सुनते ही वह स्त्री घबरा गयी और उसने सब हाल कह दिया। मत्स्येनद्रनाथ उसे साथ ले उस गड्ढेके पास गये और वहाँ अलख शब्द किया। उसे सुनते ही बारह वर्ष का एक तेडपुञ्ज बालक वहाँ प्रकट हो गया औऱ मत्स्येन्द्रनाथ के चरणों पर सिर रखकर प्रणाम करने लगा। यही बालक आगे चलकर गोरक्षनाथके नाम से प्रसिद्ध हुआ। मत्स्येन्द्रनाथ ने उस समयसे बालकको साथ ही रखा और योगकी पूरी शिक्षा दी। गोरखनाथने गुरूपदिष्ट मार्गसे साधना पूरी की और स्वानुभवसे योगमार्गमें और भी उन्नति की। योगसाधन और वैराग्य में वे गुरुसे भी आगे बढ गये। योगबलसे उन्होंने चिरञ्जीव-स्थितिको प्राप्त किया।
गोरखनाथे के दो प्रधान शिष्य हुए- गैनीनाथ या गैबीनाथ और चर्पटीनाथ। उनके नाथ-सम्प्रदायमें निवृतिनाथ, ज्ञानेश्वर आदि और भी कई सिद्ध-महात्मा हो गये हैं। गोरखनाथ केवल योगी ही नहीं थे, वरं बडे विद्वान् और कवि भी थे। उनके गोरक्षकल्प, गोरक्षसंहिता, गोरक्षसहस्त्रनाम, गोरक्षशतक, गोरक्षपिष्टिका, गोरक्षगीता तथा विवेकमार्तण्ड आदि अनेक ग्रन्थ संस्कृत-भाषामें मिलते हैं। हिन्दीमें भी उनकी बहुत-सी कविताएँ मिलती हैं।
श्रीमत्स्येन्द्रनाथकी तरह श्रीगोरखनाथको भी नेपालके लोग बडे आदरकी दृष्टि से देखते हैं और इन्हें श्रीपशुपतिनाथ जी का अवतार मानते हैं। नेपालके भोगमती, भातगाँव, मृगस्थली, चौघरा, स्वारीकोट, पडछान इत्यादि कई स्थानों में उनके योगाश्रम हैं। आज भी नेपालराज्य की मुद्रापर एक और श्रीश्रीश्रीगोरखनाथ लिखा रहता है। गोरखनाथजीके शिष्य होनेके कारण ही नेपाली गोरखा कहलाते हैं। गोरखपुरमें कहते हैं, उन्होंने तपस्या की थी। यहाँ उनका बहुत बडा मन्दिर है। जहाँ दूर-दूरसे नेपाली यात्री बहुत आया करते हैं। गोंडा जिलेके पाटेश्वरी नामक स्थानमें भी उनका योगाश्रम तथा महाराष्ट्र-प्रान्तमें ओढ्य नागनाथके पास उनकी तपस्थली है।
स्वामी स्वात्माराम योगी
योग के हठयौगिक क्रम में स्वामी स्वात्माराम एक अत्यन्त प्रचलित योगी हुए। इनका समय 15 वीं-16 वीं शताब्दी माना जाता है। यदि क्रमानुसार देखें तो शिवसंहिता के अनन्तर इनके द्वारा लिखित हठयोगप्रदीपिका ग्रन्थ का नाम आता है। हठयोग का राजयोग का सोपानभूत मानकरके इन्होंने केवल राजयोग अर्थात् समाधियोग की प्राप्यता के लिये ही इस ग्रन्थ का प्रणयन किया है। चतुरङ्गयोग की श्रृंखला में प्रथम उपदेश में हठयोग के नियमों के साथ हठयोग का प्रथम अङ्गभूत आसन का विवेचन। द्वितीय उपदेश में प्राणायाम का तत्त्वात्मक वर्णन, तृतीय उपदेश मुद्रा के स्वरूप का अवबोधक है और इसी तरह चतुर्थ उपदेश प्रत्याहारादिरूप समाधिक्रम का सारल्येन विवेचन किया गया है। आज के समय में हठयोगाभ्यासियों के लिये यह अत्यन्त उपयोगी ग्रन्थ है।
घेरण्ड ऋषि
प्राचीन समय में घेरण्ड नामक एक ऋषि हुए जो हठयोग के आचार्य माने जाते हैं। इन्होंने घट शोधन के लिये सप्ताङ्ग योग का प्रतिपादन किया। जिसे आज के साधक घेरण्डसंहिता के नाम से जानते हैं। यह ग्रन्थ आज के समय में हठयोग के अभ्यासियों के लिये पाथेय स्वरूप है। इसमें षट्कर्म द्वारा शरीर का शोधन, आसन द्वारा शरीर में दृढता, मुद्रा से स्थिरता, प्रत्याहार द्वारा धैर्य, प्राणायाम से लाघवता, ध्यान द्वारा आत्मसाक्षात्कार और समाधि द्वारा निर्लिप्तता का प्रतिपादन किया है।
योगिवर श्यामचरण लाहिडी
काशीके परम श्रद्धास्पद श्रीश्यामचरण लाहिडी महाशय एक उच्च कोटिके राजयोगी हो गये हैं। श्रीमद्भगवद्गीतामं योगी और भक्तके जितने लक्षण वर्णित हैं, वे सब उनमें पूर्ण विकसित दिखायी देते थे। उनकी बातचीत, वेशभूषा, आचार-व्यवहारमें कहीं लेशमात्र भी आडम्बर नहीं था। वे सन्यासी नहीं थे, स्त्री-पुत्र-पररिवारके साथ संमसारमें रहते थे, जीविकाके लिये कार्य करते थे और फइर भी जलस्थित पद्मपत्रके समान सदा पूर्णरूपसे निर्लिप्त दिखायी देते थे। कोई दुःख, कोऊ कष्ट, कोई विप्ति उन्हगें स्पर्श नहीं करती थी-उनका हृदय, जो देवताके साथ घनिष्ठता से मिला हुआ था, उसका अतुल आनन्द उनके मुखमण्डलको बराबर मधुर प्रभासे आलोकित रखता था। उनके चारों ओर यद्यपि सैक़डों कामोंकी घटा लगी रहती थी, कर्मरूपी वर्षा हुआ करती थू, बिजली तडका करती थी, फिर भी उनका अन्तःकरण अभ्रभेदी गिरिशिखरकी तरह ज्ञानकी प्रभा और शा3न्तिकी स्निग्ध किरणों से निरन्तर समुज्ज्वल रहा करता था। अहङ्कार और आत्मगौरवकी भावना तो उन्हें छूतक नहीं गयी थी। वह इतनी नम्रतापूर्ण वाणीसे अपने को सदा ढके रखते कि लोगोंको उनके महत्त्व अथवा अपूर्व योगैश्वर्यका पता ही नहीं लगता थी। वे अपने शिष्योंको सदा यही उपदेश दिया करते थे कि अपनेको सबसे अधिक छोटा समझो। वे बडे ही अल्भाषी थे, परन्तु जो दो-चार बातें उनके मुँहसे निकलतीं वे उनके अन्तर्निहित गभीर ज्ञानकी परिचायक होती थीं। उनका प्रेम विश्वव्यापी था, वे भी अन्यान्य महापुरुषोंकी भाँति लोककल्याणकारी चिन्ता किया करते थे, परन्तु उनकी विचारधारा अन्य प्रकारकी थी। वे चुपचाप घरके कोनेमें बैठकर आत्मध्यानमें मग्न रहा करते थे और जो कोई उनके पास आता उसे बिना किसी विचारके कल्याणमार्गका उपदेश देते थे। भक्तोंके सामने कभी-कभी गीता के गूढ रहस्यकी व्याख्या किया करते थे। इस तरह उन्होंने विभिन्न स्थानों से आये हुए सैकडों पथभ्रान्त जीवोंको सुपथपर लगाया, कितने ही व्यथित, रोगपीडित व्यक्तियों को रोग दूर करनेका उपाय बतलाया, कितने कठिन प्रश्नोंका उत्तर देकर असंख्य प्राणियोंकी शंकाका निवारण किया। फिर भी उन्होंने कभी किसी से कुछ चाहा नहीं।
उनका जन्म नदिया जिलाके घुरनी नामक गाँवमें हुआ था। परन्तु बचपनमें ही वे माता-पिताके साथ काशी आ गये और यहीँ उनकी शिक्षा-दीक्षा हुऊ तथा 35 वर्ष की आयुमें सरकारी कामसे रानीखेत गये। यहींपर अपने पूर्वजन्मकी स्मृति हो आयी और धोडे दिनोंमें ही उन्होंने साधनासम्बन्धी सारी बातें जान ही नहीं लीं, वरं योगियोंकी बहुत ऊँची सिथ्ति प्राप्त कर ली। जूब गुरुने गेखा कि शिष्यका काम पूरा हो गया तब उन्होंने कहा कि अब तुम इस स्थानसे चले जाओगे। वास्तवमें उसी दिन उन्हें अपने अफसरका पत्र मिला। श्रीश्यामाचरणजीने चाहा कि लौकरी छोकर सदा के लिये गुरुचरणों में आश्रय ले लूँ, परन्तु – गुरुने कहा कि ऐसा करनेकी आवश्यकता नहीं। अब मेरा कार्य समाप्त हो गया। मेरे साथके इन साधकोंका भी भार अब तुम्हींपर है। नौकरी करते हुए साधनपथपर लगे रहो और ऐसे मुमुक्षु साधकोंक इस योगमार्गकी श्रिक्षा देकर कलोककल्याण करते रहो। गुरु-आज्ञाको उन्होंने शिरोझीर्य किया और तदुरूप ही कार्य. करते रहे। लौकरीसे पेन्शन मिलतेपर वे परुनः काशीमें ही आकर रहने लगे। यहींपर लगभग 70-72 वर्षकी आयुमें उन्होंने सं. 1895 में ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त किया। बंगाल, बिहार, उडीसा, युक्तप्रान्त इत्यादि भागोंमें इनके बहुसंख्यक शिष्य पाये जाते हैं।
परमहंस श्रीरामकृष्णदेव
परमहंस श्रीरामकृष्णदेव बंगालके एक बहुत बडे महात्मा हो गये हैं। उनका जन्म 18 फरवरी, सन् 1836 ई.को हुगली जिलेके कामारपूकुर नामक गाँवमें अक सत्यपरायण धर्मनिष्ठ ब्राह्मणके घर में हुआ। माँ-बापने उनका नाम गदाधर रखा। बालक गदाधर में जन्मसे ही बहुत सुलक्षण देखे जाते थे। उनकी बुद्धि तीक्ष्ण थी, शास्त्रोंके श्रवण,साधु-सेवा और सत्संग आदिमें उनका बडा मन लगता था। प्रायः नौ वर्षकी उम्रमें यज्ञोपवीत-संस्कार होनेके बाद उन्हें कुलके इष्टदेव भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी पूजाका भारसौंपा गया। वे बडे प्रेम और श्रद्धा से पूजा किया करते। पूजाके समय वह यही समझते कि मै साक्षात् भगवान्की पूजा-अर्चा कर रहा हूं और इस तरह वह घंटों ध्यानमें ब7ठे रहते । धीरे-धीरे उनका मन पूजा-पाठ औऱ भजन-कीर्तनमें इतना रम गया कि उन्होंने पढना-लिखना भी छोड दिया। उनकी यह दशा देखकर उनके बडे भाई रामकुमार उन्हें अपने साथ कलकत्ते ले आये। परन्तु यहाँ भी गदाधरका मन पढने-लिखनेमें नहीं लगा।भाईके बहुत करने-सुननेपर एक दिन उन्होंने स्पष्ट ही उत्त्र दे दिया, दादा मुझे ऐसी विद्या पठने की इच्छा नहीं जो केवल पेट भरने के लिये ही काममें आवे, मैं तो वह विद्या प्राप्त करना चाहता हूँ जिससे नित्य तृप्तिकी प्राप्ति हो। निदान भाईने उन्हें कुछ कहना-सुनना छोड दिया।
राजकुमार पीछे कलकत्तेकी रानी रासमणिके दक्षिणेश्वरके काली-मन्दिरम पुजारी नियुक्त हो गये। गदाधर भी उनके साथ ही वहाँ रहते थ। रानी रासमणिके जामाता मथुराबाबूकी दृष्टि इनपर पडी। उनकी इच्छा हुई कि ये भई पूजा-कार्यमें सहायता दें। एतएव उन्होंने गदाधर को माँ काली की पूजा के ये नियुक्त कर दिया। यहीं से गदाधर की मुख्या साधना शुरु हुई। वे बडी श्रद्धा-भक्तिके साथ पूजा करने लगे। वे मूर्तिको मूर्ति नहीं, वरं साक्षात् चिन्मय आद्या-शक्ति समझते थे। वे उनकी सेवा-पूजामें इतने निमग्न हो जाते थे कि कभी-कभी उन्हें बाह्यज्ञान बिलकुल नहीं रहता था। कभी-कभी पूजाका क्रम भी भूल जाते, आरती करनेमें समयका कुछ भी ध्यानन रहता, कभी पूजा-पाठ छोड घंटों ध्यानमें पडे रहते। यहाँतक नौबत आ गयी कि लोग उन्हें पागल समझने लगे, परन्तु रानी रासमणि और मथुराबाबू उन्दें खूब समझते थे, उन्होंने कभी उनकी साधनामें बाधा नहीं दी, बल्कि यथासाध्य अपनी ओरसे बराबर सहायता पहुँचानेकी ही चेष्टा करते रहे। अतएव गाधर की साधना दिन-पर-दिन विकसित होती गयी। वे मा3 काली के दर्शनके लिये व्याकुल हो उठे। रात-दिन भूख-प्यास औऱ निद्राकी कोई परवा न कर वह नरन्तर ध्यानमें ही रहने लगे और माँ के , भगवान्के विरहमें छटपटाने लगे। उन्होंने भगवद्दर्शनमें जि-जिन बातोंको बाधक समझा, उन्हें कठोर तपस्या करके अपने अन्दरसे निकाल दिया। हर तरहके अभिमानको दूर किया, धनकी कामनाको इस तरह अपने अन्दरसे दूर किया कि द्रव्यके छु जानेपर उनके शरीरकता चमडा समाधि-अवस्आमें भी सङ्कुचित हो जाता था, इसी तरह कामवासना आदि समस्त विकारोंको नष्टकर शरीर शुद्ध कर लिया। फिर भी जब माताके दर्शन न हुए तो उनके ह्रदयकी वेदना असह्य हो उठी और एक दिन अत्यन्त कातर स्वरमें माताके सम्मुपख जाकर रोते हुए बोले- माँ मेरे सम्मुख क्यों नहीं आती तेरे दर्शन बिना यह जीवन ही वयर्थ है। उस जीवनसे ही क्या लाभ जिसमें तेरी दिव्य ज्योति के दर्शन न हों इतना कहते-कहते उनकी दृष्टि अचानक मन्दिरमें रखी उई एक तलवारपर जा पडी। उन्होंने झट उसे उठा लिया औऱ अपना सिर काटकर माताके चरणोंमें चञानेही वाल थे कि तत्क्षण माँ भगवती प्रक टहो गयी और उन्होंने अपनी दिव्य ज्योतिसे उन्हें आच्छादि कर लिया। गदाधर बेहोश होकर गिर पडे।
गदाधरके पागलपनकी बात सर्वत्रफैल गयी। बडे भाई और माँको बडी चिन्ता हुऊ। अतएव उनोहंने गदाधरको संसारमें जकडने के लिये सन्1845 ई. में शारदाममणु नाम्नी एक पञ्चवर्षीया बालिकाके साथ उनकी शादी कर दी। परन्दु गदाधर माताके भक्त थे औऐऱ स्त्रीमात्रको माताके रूपमें ही देखते थे। उन्होंने शारदामणिके साथ भी वह भाव रखा। परम सौभाग्यवती देवीस्वरूपिणी शारदामणिने भी पतिके भावमें कोई बाधा नहीं खडी की और पीछे वे भई उन्हींके मार्गपर आ गयीं। पतिदेवकी आज्ञा और उपदेशके अनुसार चलकर वेभी अच्छी गतिको प्राप्त हुईं।
गदाधरने अपने जीवनमें प्रायः सभी शास्त्रोक्त साधनपथोंका अनुसरण किया, यहाँतक कि मुसलमानधर्म और ईसाईधर्मके अनुसार भी साधना की और सब साधनाओंमें सिद्धि प्राप्त की। जब उन्होंने वेदान्त-शिक्षा प्राप्त करनेके लिये सन्याकी दीक्षा ली तब उनका नाम रामकृष्ण पडा और पीछे उसनी नामसे विख्यात हुए।उनके जीवनकी बहत-सी विचित्र घटनाएं सुनी जाती हैं, जो स्थानाभावके कारण यहाँ नहीं दी जा सकतीं।
रामकृष्ण ज्यों-ज्यों साधनामें अग्रसर होने लगे त्योंही-त्यों उनकी ख्याति भी बढती गयी औऱ चारों ओर से लोग उनके दर्शनों और उपदेशश्रवणके लिये आने लगे। उससमयके अधिकांश विद्वान् और प्रसिद्ध लोग भी उनके पास आते और अनके उपदेश सुनते थे। उनके शिष्योंमें सबसे प्रधान स्वामी विवेकानन्द हुए, जिन्होंने देव-विदेशमें उनके सन्देशको फैलाया और उनके नामपर एक साधनसम्प्रदाय ही चला दिया। आज भी देश-विदेशमें अनेकों ऐसी संस्थाएंश्रीरामकृष्ण परमहंसके नामपर चलती हैं, जिनका उद्देश्य ही सब तरहससे लोककल्याण करना है।
श्रीरामकृष्ण परमहंस 15 अगस्त,सन् 1886 ई. को कलकत्तेमें माँ काली का नाम जपते हुए महासमाधिमें लीन हो गये।

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