सनातन परम्परा में शक्ति की उपासना
लेखकः - योगाचार्यः रितेशब्रह्मचारी
शक्ति की उपासना सनातन परम्परा में अनादि काल से ऋषियों के द्वारा किया जाती रही है। शाक्त सम्प्रदाय विशिष्ट पूर्णतया भगवती जगज्जननी जगदम्बा को समर्पित एक शास्त्रोक्त वैदिक पथ है। भारतीय मनीषा शक्ति की उपासना को उतना ही प्राचीन मानती है, जितना शिववांङ्मय में सर्वप्राचीन साहित्य अपौरुषेय वेद को। वस्तुतः यही कारण है कि ऋग्वेद में इंद्र, वरुण, यम, सूर्य, विष्णु, अग्नि एवं रुद्र आदि देवों से संबद्ध सूक्तों के साथ-साथ इंद्राणी, वरुणानी, यमी, उषस्, श्री एवं रुद्राणी की भी समान रूप से उपासना की गई है तथा स्वाहा को अग्नि की पत्नी के रूप में स्वीकार किया गया है
वस्तुतः देवता हों या देवियां, सभी की स्तुति में शक्ति की आराधना ही उसका मूलाधार है, क्योंकि शक्ति एवं शक्तिमान का परस्पर आधाराधेय संबंध से आप्लावित है। ब्रह्मा की सृर्जनकता, विष्णु की व्यापकता या प्रजापालकता तथा शिव की शिवता या संहारकता मात्र शक्ति के कारण ही सम्भव है। शक्ति के बिना कुछ भी संभव नहीं है।
व्याकरण के अनुसार यह शक्ति शब्द शक् धातु क्तिन् प्रत्यय करने पर निष्पन्न होता है।जिसकी व्युत्पत्ति आचार्यों ने किया है – शक्यते जेतुमनया सा शक्तिः अथवा कायजननसामर्थ्यम् इत्यादि नानार्थ माना जाता है।मार्कण्डेय ऋषि लिखते हैं – या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता... अर्थात् शक्ति रूप से सम्पूर्ण मानवों में व्याप्त मै सर्वेश्वरी भगवती को प्रणाम करता हूं।अन्य आचार्यों ने तात्पर्यार्थ माना है कि वह साधन जिससे कोई भी व्यक्ति कुछ भी करने में समर्थ हो पाता है। इसीलिए पृथक्-पृथक् पात्रों में यह शक्ति पृथक्-पृथक् अस्तित्व का बोध भी कराती है। शक्ति के उपासना रूपों ने वर्तमान स्वरूप चाहे बाद में धारण किया हो, किंतु इनका मूल अस्तित्व तो सृष्टि के साथ अथवा उसका पूर्ववर्ती ही सिद्ध होता है। यह शक्ति को शास्त्रकारों ने त्रिविध विभज्य किया है यथा – सा प्रभावोत्साहमन्त्रजभेदात्त्रिविधाः अर्थात् प्रभाव, उत्साह एवं मन्त्र इन की उत्पादिका शक्ति ही है। प्रभुशक्तित्व से प्रभाव, मानवों के अन्दर विक्रम स्वरुप स्वशक्यत्व रूप से उत्साह स्वरूपा तथा सन्ध्यादि एवं सामादिवेदों में मन्त्रत्व रूप से विराजमान मानी गई हैं। श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में बृहद् स्वरूप में भगवती का स्वरूप बोध, उपासना क्रम तथा अहैतुकी कृपा विषयक विभिन्न उपाख्यानों का विशद विवेचन प्राप्त होता है। वैस तो देवी अनेक स्वरूप में व्याप्त हैं उसमें भी द्विविध नवरात्री गुप्त एवं प्रगट स्वरूप में नवशक्तियों की विशेष समाराधन का क्रम निर्धारित है। तथापि प्रबुद्ध जन स्वकार्य सिद्धता हेतु त्रिविध देवीयों की उपासना साधकों को उपदिष्ट करते हें। ज्ञान तथा बुद्धि वैभवार्थ भगवती श्वेतपद्मासना सरस्वती की उपासना जो ब्रह्मा की शक्ति विशिष्टा स्वरूपा मानी जाती हैं। तदनुसार भगवान् नारायण की शक्ति स्वरूपा माता लक्ष्मी जो सम्पूर्ण सृष्टि के प्रत्येक कार्य धार्मिक तथा औपचारिक उभय कार्य निर्वाहार्थ जिनकी नितान्त आवश्यकता देखी जाती हैं ऐसी धन-धान्य स्वरूप शक्तता प्रदान करने वाली भगवती लक्ष्मी का विशेष स्थान माना गया है। इसी प्रकार भगवान् शिव की प्राणवल्लभा संहारशक्ति प्रधान भगवती महाकाली जो आगमोक्त विधा में अत्यन्त निगुढ मानी गयी हैं। जिनकी आराधना अत्यन्त दुष्प्राप्य बताया गया है। इस तरह हम कह सकते हैं कि ज्ञान, वैभव तथा सामर्थ्यादि की प्राप्ति के लिये इन तीन शक्तियों की आराधना अत्यन्त आवश्यक है।
जिस प्रकार संस्कृत व्याकरण के अनुसार वाक्य में क्रिया की प्रधानता निर्विवाद है और सांख्यशस्त्रियों के मत में प्रकृति सभी का मूल है। उसी प्रकार शाक्तमत में अथवा लोकव्यवहार में शक्ति का प्राधान्य सर्वथा मान्य है। सारस्वत साधकों की दृष्टि में वेद हो या तंत्र, व्याकरण हो या स्थापत्य साधना हो या भक्ति, निर्गुण हो या सगुण उपासनाएं और लोक हो या वेदांत, सर्वत्र शक्ति की ही प्रमुखता देखी जाती है।
पौराणिक साहित्य के अंतर्गत उसका रूप कहीं देवपत्नियों एवं अप्सराओं ने ग्रहण किया है तो कहीं परावाक् काली, दुर्गा, श्रद्धा, माया, सीता, सावित्री एवं अनसूया सदृश नारियों ने। इसी प्रकार अन्नपूर्णा, लक्ष्मी, सरस्वती, पृथ्वी, रात्रि, पीतांबरा, बगलामुखी, भगवती राजराजेश्वरी, त्रिपुरसुंदरी एवं भगवती भुवनेश्वरी प्रभृति दस महाविद्याओं की आराधना भी शक्ति की उपासना के ही विविध रूप हैं।
जिस प्रकार ऋग्वेद के ऋषि एक ओर सभी देवों की पूजा को एक ही ब्रह्म की विविधायामी पर्याय मानते हैं, उसी प्रकार दूसरी ओर सभी देवियों को भी वे तत्वतः एक ही मानते हैं। देवी कहती हैं- 'मैं रुद्रों एवं वसुओं के रूप में विचरण करती हूं। मैं आदित्यों एवं विश्वेदेवों के रूप में निवास करती हूं, मित्रावरुण को धारण करती हूं और मैं ही इंद्र, अग्नि एवं अश्विनीकुमारों की आधारभूमि हूं।'
शिव शक्ति से युक्त होकर ही सृष्टि का संचालन
करने में समर्थ हो पाते हैं। भगवती की पराशक्ति से युक्त न होने पर उनमें स्पंदन
तक संभव नहीं है। सृष्टि, संहार या संतुलन रखने में भी वे स्वयं
समर्थ नहीं है, क्योंकि प्रकृति के बिना पुरुष मात्र कल्पना
है।
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