बुधवार, 27 मार्च 2024

घेरण्डसंहिता- लेखनकार्यः



                                     घेरण्डसंहिता

                                          प्रथमोपदेशः- षट्कर्मसाधनानि

            एकदा चण्डकापालिः गत्वा घेरण्डकुट्टिकमम्।

         प्रणम्य विनयाद् भक्त्या घेरण्डं  परिपृच्छति।।1

अन्वयः- एकदा चण्डकापालिः घेरण्डकुट्टिमं गत्वा विनयाद् भक्त्या प्रणम्य घेरण्डं परिपृच्छति।

व्याख्या- एक समय सम्प्रति किसी राज्य विशेष के योगजिज्ञासु नृप चण्डकापालि ने भक्तिभाव युक्त विनय पूर्वक प्रणाम करके ऋषि घेरण्ड से पूछा।

                       चण्डकापालिरुवाच

घटस्थयोगं योगेश तत्त्वज्ञानस्य कारणम्।

इदानीं श्रोतुमिच्छामि  योगेश्वर वद प्रभो।।2

अन्वयः-हे योगेश्वर इदानीं तत्त्वज्ञानस्य कारणं घटस्थयोगं हे योगेश श्रोतुम् इच्छामि अतः हे प्रभो वद।

व्याख्या- हे योगेश्वर !  तत्त्वज्ञान के प्रति कारणभूत जो घटस्थ(शरीरस्थ) योग है, इस समय उसे सुनने की मेरी इच्छा है। हे प्रभो ! हे योगेश ! आप कृपा पूर्वक हमारे प्रति उसे कहें।

                  श्रीघेरण्ड उवाच

साधु साधु महाबाहो यस्मात् त्वं परिपृच्छसि।

कथयामि च ते वत्स सावधानोSवधारय ।।3

अन्वयः- हे महाबाहो साधु साधु (प्रथमं तावद्) यस्मात् (कारणात्) त्वं परिपृच्छसि। हे वत्स ते हि कथयामि सानधानेन अवधारय।

व्याख्या - हे महाबाहु तुम्हारी जिज्ञासा के लिये मैं तुम्हें साधुवाद देता हूं। हे वत्स तुमने जिव विषय की इच्छा प्रकट की है उसे मैं कहता हूं, सावधान पूर्वक उसको अवधारित करो।

नास्ति मायासमं पापं नास्ति योगात्परं बलम्।

नास्ति ज्ञानात्परो  बन्धुर्नाहङ्कारात्परो  रिपुः।।4

अन्वयः- मायासमं पापं नास्ति योगात् परं बलं नास्ति। ज्ञानात् परः बन्धुः नास्ति तथा च अहङ्कारात् परः रिपुः नास्ति।

व्याख्या-

अभ्यासात्कादिवर्णानि यथा शास्त्राणि बोधयेत् ।

तथा योगं समासाद्य तत्त्वज्ञानञ्च लभ्यते ।। 5 ।।

 

भावार्थ :- जिस प्रकार  आदि वर्णमाला ( अक्षरों ) को जानने से हमें शास्त्रों का ज्ञान हो जाता है । ठीक उसी प्रकार योग में सिद्धि अथवा सफलता प्राप्त करने से साधक को तत्त्वज्ञान अर्थात् यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है ।

 

 

सुकृतैर्दुष्कृतै: कार्यैर्जायते प्राणिनां घट: ।

घटादुत्पद्यते कर्म घटियन्त्रं यथा भ्रमेत् ।। 6 ।।

 

भावार्थ :- मनुष्य का शरीर अच्छे व बुरे कर्मों का परिणाम है अर्थात् इस मानव शरीर की उत्पत्ति अच्छे व बुरे कर्मों से ही होती है । जिस प्रकार घटियन्त्र ( पुराने समय में बैलों के सहारे जमीन से पानी निकालने वाला यन्त्र जिसे रहट कहा जाता था ) ऊपर से नीचे की ओर घूमता रहता है । उसी प्रकार हमारा शरीर कर्म करता रहता है और उन्हीं कर्मों के कारण शरीर की उत्पत्ति होती रहती है । यह एक प्रकार का जीवन चक्र है जो रहट की तरह लगातार घूमता रहता है ।

 

 

ऊर्ध्वाधो भ्रमते यद्वद् घटियन्त्रं गवां वशात् ।

तद्वत्कर्मवशाज्जीवो भ्रमते जन्ममृत्युभि: ।। 7 ।।

आमकुम्भमिवाम्भस्थो जीर्यमाण: सदा घट: ।

योगानलेन सन्दह्य घटशुद्धिं समाचरेत् ।। 8 ।।

 

भावार्थ :- जिस प्रकार कच्चे घड़े में पानी डालने से वह निरन्तर गलना शुरू हो जाता है । उसी कच्चे घड़े के समान मनुष्य का शरीर की प्रतिक्षण कमजोर होता रहता है । उस शरीर रूपी घड़े को योग रूपी अग्नि में तपाने से वह पूरी तरह से शुद्ध हो जाता है । जिस प्रकार घड़े को अग्नि में तपाने के बाद वह पानी से गलता नहीं है । ठीक उसी प्रकार इस श्लोक में योग को अग्नि का रूप और शरीर को घड़े का रूप माना गया है ।

 

 

सप्तांग योग ( योग के सात अंग )

 

शोधनं दृढता चैव स्थैर्यं धैर्यञ्च लाघवम् ।

प्रत्यक्षञ्च निर्लिप्तञ्च घटस्य सप्तसाधनम् ।। 9 ।।

 

भावार्थ :- शरीर को परिपक्व करने के लिए योग के सात अंगों की चर्चा की गई है । जो इस प्रकार हैं शोधन, दृढता, स्थिरता, धैर्य ( धीरता ), लघुता ( हल्कापन ), प्रत्यक्षीकरण व निर्लिप्तता । अगले श्लोकों में इन सभी अंगों से सम्बंधित यौगिक क्रियाओं का वर्णन किया गया है ।

 

 

सप्त ( योग ) साधनों के लाभ

 

 

षट्कर्मणा शोधनञ्च आसनेन भवेद्दृढम् ।

मुद्रया स्थिरता चैव प्रत्याहारेण धीरता ।। 10 ।।

प्राणायामाल्लाघवञ्चध्यानात् प्रत्यक्षमात्मनि ।

समाधिना च निर्लिप्तं मुक्तिरेवं न संशय: ।। 11 ।।

धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिर्लौलिकी त्राटकं तथा ।

कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत् ।। 12 ।।

 

भावार्थ :- योग साधक को धौति, बस्ति, नेति, लौलिकी ( नौलि ), त्राटक व कपालभाति नामक इन छ: प्रकार की शुद्धि क्रियाओं का अभ्यास करना चाहिए ।

 

विशेष:- महर्षि घेरण्ड ने षट्कर्मों को योग के पहले अंग के रूप में मान्यता दी है । उनका कहना है कि योग साधक को सबसे पहले षट्कर्मों द्वारा अपने शरीर का शुद्धिकरण करना चाहिए । इसके बाद ही साधक अन्य प्रकार की योग साधना करने के योग्य होता है । षट्कर्मों को मुख्य रूप से प्रचारित करने का श्रेय भी घेरण्ड ऋषि को ही जाता है । इन्होंने छ: षट्कर्मों के भी अलग- अलग प्रकारों का वर्णन करके इसको घेरण्ड संहिता के एक पूरे अध्याय का रूप देकर इनकी उपयोगिता को दर्शाया है ।

 

 

धौति के प्रकार

 

अन्तर्धौतिर्दन्तधौतिर्हृद्धौतिर्मूलशोधनम् ।

धौतिं चतुर्विधां कृत्वा घटं कुर्वन्ति निर्मलम् ।। 13 ।।

 

भावार्थ :- इस श्लोक में धौति के चार प्रकार बताते हुए कहा है कि अन्तर्धौति, दन्तधौति, हृदयधौति व मूलशोधन यह धौति के चार प्रकार हैं । साधक को इनका अभ्यास करके अपने शरीर की शुद्धि करनी चाहिए ।

 

 

विशेष :- इस श्लोक में षट्कर्म के पहले अंग अर्थात् धौति के चार प्रकारों का वर्णन किया गया है । धौति मुख्य रूप से चार प्रकार की होती है और यदि धौति के इन चार प्रकारों के भी अलग- अलग प्रकारों या भेदों की बात करें तो इनकी कुल संख्या तेरह ( 13 ) हो जाती है । परीक्षा की दृष्टि से यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण जानकारी है । जिसे ऊपर दिये गए डायग्राम द्वारा आसानी से समझा जा सकता है ।

 

 

अन्तर्धौति के प्रकार

 

वातसारं वारिसारं वह्निसारं बहिष्कृतम् ।

घटस्य निर्मलार्थाय अन्तधौतिश्चतुर्विधा ।। 14 ।।

 

भावार्थ :- शरीर को शुद्ध करने के लिए साधक को अन्तर्धौति की निम्न चार प्रकार अथवा विधियों ( वातसार, वारिसार, वह्निसार ( अग्निसार ) और बहिष्कृत ) का अभ्यास करना चाहिए ।

 

 

विशेष :- धौति के चार प्रकारों में सबसे पहले प्रकार अर्थात् अन्तर्धौति के भी चार भेद बताये गये हैं । इनके क्रम व संख्या को परीक्षा की दृष्टि से बहुत उपयोगी माना जाता है । अतः विद्यार्थी इनको अच्छी प्रकार से याद करें । आगे के श्लोकों में इन सभी की विधि व इनसे मिलने वाले लाभ बताये जायेंगे ।

 

 

वातसार धौति विधि

 

काकचञ्चुवदास्येन पिबेद् वायुं शनै:शनै: ।

चालयेदुदरं पश्चाद्वर्त्मना रेचयेच्छनै: ।। 15 ।।

 

भावार्थ :- साधक को अपने मुहँ को कौवे की चोंच की तरह बनाकर उससे धीरे- धीरे से प्राणवायु को पीना चाहिए अर्थात् प्राणवायु को शरीर के अन्दर ग्रहण करना चाहिए । फिर अपने पेट को चलाते हुए ( आगे- पीछे या दायें से बायीं ओर घुमाते हुए ) उस वायु को पीछे अर्थात् गुदा मार्ग से धीरे- धीरे बाहर निकालना चाहिए ।

 

 

विशेष :- वातसार को याद रखने के लिए विद्यार्थी वातसार शब्द को पहले दो अलग- अलग भागों वात और सार में बाट ले । वात का अर्थ है वायु और सार का अर्थ है उसका निचोड़ । अब इसे आसानी से याद किया जा सकता है कि वायु को पीकर उसको निचोड़ देना चाहिए । निचोड़ने का अर्थ होता है उसके उपयोगी तत्त्व को निकाल लेना । जब हम किसी पदार्थ के आवश्यक तत्त्व को निकाल लेते हैं तो उसके बाद उस पदार्थ का क्या करते हैं ? निश्चित रूप से हम उसे अवशिष्ट पदार्थ की तरह फेंक देते हैं । इसे एक उदाहरण से समझते हैं । जैसे एक नींबू के रस को निचोड़ने के बाद जिस प्रकार उसके छिलके को हम फेंक देते हैं । ठीक उसी प्रकार जब हमने वायु को पेट में चलाकर उसके सार को ग्रहण कर लेते हैं तो उसे भी हम निश्चित रूप से बाहर ही फेंकेते हैं । और जिस वायु का शरीर के भीतर प्रयोग कर लिया गया हो तो उसका निष्कासन तो नीचे अर्थात् गुदा मार्ग से ही किया जाएगा । ऐसे ही हम भोजन को ग्रहण करके उसके रस को पचाकर बाकी बचे हुए अवशिष्ट को गुदा मार्ग द्वारा ही बाहर निकाल देते हैं । इस उदाहरण द्वारा आप इसकी विधि को आसानी से याद रख सकते हैं ।

 

 

वातसार धौति लाभ

 

वातसारं परं गोप्यं देहनिर्मलकारणम् ।

नाशयेत्सकलान् रोगान्  वह्निमुद्दीपयेतथा ।। 16 ।।

 

भावार्थ :- वातसार अत्यन्त गुप्त रखने वाली यौगिक क्रिया है । इसका अभ्यास करने से साधक का शरीर स्वच्छ ( मल रहित ) हो जाता है । यह शरीर के सभी रोगों को नष्ट करती है और जठराग्नि ( पाचन क्रिया ) को तीव्र अर्थात् मजबूत करती है ।

 

 

वारिसार धौति विधि

 

आकण्ठं पूरयेद्वारि वक्त्रेण च पिबेच्छनै: ।

चालयेदुदरेणैव चोदराद्रेचयेदध: ।। 17 ।।

 

भावार्थ :- जल ( पानी ) को मुहँ द्वारा धीरे- धीरे इतनी मात्रा में पीना चाहिए जिससे कि वह गले तक आ जाये अर्थात् इतना पानी पीना चाहिए कि वह गले तक आ जाये । इसके बाद अपने पेट को चलाते हुए ( आगे-पीछे अथवा दायें से बायें ) उस पानी को अधोमार्ग ( गुदा द्वार ) से बाहर निकाल दें ।

 

 

विशेष :- वारिसार की विधि और वातसार की विधि दोनों ही पूरी तरह से मिलती जुलती ही है । इसको याद रखने के लिए विद्यार्थी को केवल इसके पहले शब्द को समझने की आवश्यकता है । वातसार और वारिसार शब्दों में पीछे के दोनों शब्द ( सार ) समान हैं । वातसार में वात का अर्थ होता है वायु और वारिसार में वारि शब्द का अर्थ जल अथवा पानी होता है । बाकी की विधि बिलकुल समान है । वातसार में यह क्रिया वायु के द्वारा पूरी होती है और वारिसार में यह क्रिया पानी के द्वारा पूरी की जाती है । बाकी सब समान विधि समान होती है । अतः सभी छात्रों को केवल वात ( वायु ) और वारि ( जल ) शब्दों को ही याद रखना है ।

 

 

वारिसार धौति लाभ

 

 

वारिसारं परं गोप्यं देहनिर्मलकारणम् ।

साधयेत्तं प्रयत्नेन देवदेहं प्रपद्यते ।। 18 ।।

 

भावार्थ :- वारिसार क्रिया भी वातसार की तरह ही अत्यन्य गोपनीय यौगिक क्रियाओं में से एक है । इसका अभ्यास करने से साधक का शरीर पूरी तरह से स्वच्छ ( विजातीय द्रव्यों से रहित ) हो जाता है । पूरे मनोभाव से इसका अभ्यास करने से साधक का शरीर देवताओं के समान दिव्य रूप ( अत्यन्य मनमोहक ) वाला हो जाता है ।

वह्निसार / अग्निसार धौति विधि

 

नाभिग्रन्थिं मेरुपृष्ठे शतवारञ्च कारयेत् ।

अग्निसार इयं धौतिर्योगिनां योगसिद्धिदा ।। 19 ।।

 

भावार्थ :- वह्निसार अपनी नाभि ( पेट के बीच में स्थित खड्डानुमा स्थान ) को मेरुदण्ड ( कमर ) के साथ सौ बार लगाने ( पेट को सौ बार आगे- पीछे करना ) को अग्निसार ( वह्निसार ) धौति क्रिया कहते हैं । यह क्रिया योगियों को साधना में सिद्धि प्रदान करवाती है ।

 

 

 

विशेष :- इस धौति क्रिया में दो नामों का प्रयोग किया गया है । एक वह्निसार और दूसरा अग्निसार । इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही होता है । वह्नि और अग्नि दोनों शब्दों का प्रयोग जठराग्नि के लिए किया जाता है । इस क्रिया का प्रचलित नाम अग्निसार है । जिसका प्रयोग ज्यादा किया जाता है । वह्नि शब्द का अर्थ भी अग्नि ही होता है । अतः वह्निसार और अग्निसार एक ही क्रिया है । इसकी विधि को हम थोड़ा सा प्रयोगात्मक स्तर पर समझने का प्रयास करते हैं । जिससे इससे सम्बंधित भ्रान्ति का निवारण किया जा सके । अपनी नाभि को कम से कम सौ बार अपनी कमर के साथ लगाना अग्निसार होती है । इसके लिए जो पूरी विधि है उसके लिए साधक पहले अपने श्वास को बाहर छोड़कर बाहर ही रोक दे । इसके बाद अपने पेट को आगे व पीछे की ओर चलाना ( धकेलना ) चाहिए । प्रारम्भ में कोई भी साधक सौ बार इसका अभ्यास एक ही श्वास में करने में समर्थ नहीं होता । इसलिए जब तक सौ बार यह क्रिया नहीं हो जाती तब तक इसका अभ्यास करते रहना चाहिए । ऐसा कुछ समय करने के बाद अर्थात् अभ्यास मजबूत होने पर साधक एक श्वास में ही इसे सौ बार आगे- पीछे करने में समर्थ हो जाता है ।

 

 

वह्निसार / अग्निसार धौति लाभ

 

 उदरामयजं त्यक्तवा जठराग्निं विवर्द्धयेत् ।

एषा धौति परा गोप्या देवानामपि दुर्लभा ।

केवलं धौतिमात्रेण देवदेहो भवेद् ध्रुवम् ।। 20 ।।

 

भावार्थ :- अग्निसार धौति का अभ्यास करने से साधक के उदर ( पेट ) से सम्बंधित सभी रोग दूर हो जाते हैं और जठराग्नि तीव्र हो जाती है । यह क्रिया देवताओं के लिए भी दुर्लभ ( कठिनता से प्राप्त होने वाली ) है साथ ही यह क्रिया अत्यन्त गुप्त रखने योग्य है । केवल इसी क्रिया का अभ्यास करने से साधक का शरीर निश्चित रूप से देवताओं के समान दिव्य तेज रूप वाला हो जाता है ।

 

 

बहिष्कृत धौति विधि

 

काकीमुद्रां शोधयित्वा पूरये दुदरम्महत् ।। 21 ।।

धारयेदर्धयामन्तु चालये द धोवर्त्मना ।

एषा धौति: परागोप्या न प्रकाश्या कदाचन ।। 22 ।।

 

भावार्थ :- काकीमुद्रा ( कौवे के समान मुख करके ) को साधकर ( उसमें पारंगत होकर ) अपने उदर ( पेट ) में वायु को मुख के द्वारा अन्दर भरना चाहिए । अब उस वायु को आधे प्रहर अर्थात् डेढ़ घण्टे तक पेट के अन्दर ही रोककर रखे और इसके बाद उस रोकी हुई वायु को गुदा मार्ग से बाहर निकाल देना चाहिए । इस धौति क्रिया के भी अति गोपनीय होने के कारण इसको कभी भी सार्वजनिक नहीं करना चाहिए ।

 

 

विशेष :- इस बहिष्कृत धौति क्रिया की विधि भी बिलकुल वातसार धौति क्रिया की तरह ही होती है । इसमें व वातसार की विधि में केवल कुम्भक ( वायु को रोकने ) का ही अन्तर है । इसके अलावा यह दोनों ही विधियाँ समान है । इसको याद रखने के लिए विद्यार्थी को बहिष्कृत शब्द के अर्थ को समझना आवश्यक है । बहिष्कृत का अर्थ होता है बाहर निकाल देना अथवा बाहर फेंक देना । जब हम किसी वस्तु का प्रयोग कर लेते हैं तो उसके बचे हुए अवशेष या अवशिष्ट को बाहर कूड़े में फेंक देते हैं । ठीक उसी प्रकार जब हम वायु को पीकर उसको शरीर में रोककर उसका उपयोग कर लेते हैं तो उसके बाद वह अवशिष्ट रूप में ही बचता है और पेट में बचे हुए अवशिष्ट को हम गुदा मार्ग से ही बाहर निकालते हैं । इसलिए विद्यार्थी इस प्रकार इसे आसानी से याद रख सकते हैं ।

 

इस क्रिया में वायु को डेढ़ घंटे तक शरीर के अन्दर रोकने की जो बात कही गई है उसका अर्थ यह नहीं है कि हम वायु को पेट के अन्दर डेढ़ घण्टे तक रोकने के बाद अपनी श्वास- प्रश्वास की क्रिया को रोक देते हैं । ऐसा करना सम्भव हो सकता है लेकिन उसके लिए साधक को बहुत वर्षों की साधना द्वारा अपने प्राण को साधना पड़ेगा । जो कि यहाँ षट्कर्म के उपदेश में न्याय संगत नहीं लगता । अगर ऐसा होता तो इस धौति का अभ्यास घेरण्ड ऋषि प्राणायाम के बाद में करने का उपदेश करते । जबकि उन्होंने इसे साधना के प्रारम्भ में ही करने की बात कही है । मेरा ऐसा मानना है कि यहाँ पर वायु को डेढ़ घंटे तक शरीर के अन्दर ही धारण करने की बात से अभिप्राय यह है कि जिस वायु को साधक काकीमुद्रा द्वारा ग्रहण करता है उस वायु को वह अपने पेट में ही स्थिर करके उसकी धीरे- धीरे चलाता रहता है और इस दौरान अपनी श्वास- प्रश्वास की प्रक्रिया को भी जारी रखता है । वह केवल उसी वायु को अन्दर रोककर रखता है जिसे काकीमुद्रा द्वारा अन्दर भरा गया था । इसके अलावा जो श्वसन क्रिया नासिका द्वारा होती है वह निर्बाध गति से चलती रहती है । उसका इस वायु ( काकीमुद्रा वाली ) से कोई सम्बन्ध नहीं होता ।

प्रक्षालन विधि

 

नाभिमग्ने जले स्थित्वा नाडीशक्तिं विसर्जयेत् ।

कराभ्यां क्षा लयेन्नाडीं यावन्मलविसर्जनम् ।। 23 ।।

 

भावार्थ :- नाभि तक के गहरे पानी में उत्कटासन में बैठकर अपनी शक्तिनाड़ी ( मलद्वार ) को बाहर की ओर निकालकर दोनों हाथों से उसको अच्छी तरह से तब तक साफ करना चाहिए जब तक कि उसके अन्दर का सारा मल ( अवशिष्ट पदार्थ ) पूरी तरह से साफ न हो जाये ।

 

 

विशेष :-  इस प्रक्षालन विधि को बहिष्कृत धौति के दूसरे प्रकार के रूप में माना जाता है साथ ही इसकी विधि बस्ति क्रिया से मिलती जुलती है । इस विधि का यहाँ पर वर्णन करने का उद्देश्य यही हो सकता है कि जब बहिष्कृत धौति से अन्दर रुकी हुई वायु को डेढ़ घंटे के बाद जब बाहर निकाला जाता है तो उससे अवश्य मलद्वार के पास कुछ मल जमा हो जाता होगा । जिसको साफ करने के लिए यहाँ पर इस क्रिया का करना आवश्यक हो जाता है । इस प्रक्षालन की विधि की गणना धौति के अंग के रूप में नहीं की जाती ।

 

 

 प्रक्षालन क्रिया लाभ

 

तावत्प्रक्षाल्य नाडीञ्च उदरे वेशयेत्पुनः ।

इदम्प्रक्षालनं गोप्यं देवानामपि दुर्लभम् ।

केवलं धौतिमात्रेण देवदेहो भवेद् ध्रुवम् ।। 24 ।।

 

भावार्थ :- उसके बाद शक्तिनाड़ी ( मलद्वार ) को साफ करके पुनः शरीर के अन्दर स्थित कर देना चाहिए । यह क्रिया अति गोपनीय होने के कारण इसे देवताओं के लिए भी यह कठिनाई से प्राप्त होने वाली माना जाता है । केवल इसी धौति क्रिया से साधक का शरीर दिव्य शरीर से युक्त हो जाता है ।

 

 

यामार्द्धं धारणे शक्तिं यावन्न धारयेन्नर: ।

बहिष्कृत महद्धौतिस्तावच्चैव न जायते ।। 25 ।।

 

भावार्थ :- जब तक मनुष्य आधे प्रहर ( डेढ़ घंटे ) तक वायु को पेट के अन्दर धारण करने के योग्य नहीं हो जाता तब तक वह बहिष्कृत नामक महाधौति को करने में समर्थ नहीं हो सकता अथवा तब तक उसे इस धौति से कोई लाभ नहीं मिलता । अतः पहले साधक को पेट के अन्दर वायु को डेढ़ घंटे तक स्थिर रखने की योग्यता विकसित करनी चाहिए ।

 

 

विशेष :- इस श्लोक में बहिष्कृत धौति को महाधौति कहकर सम्बोधित किया गया है । परीक्षा की दृष्टि से यह अत्यन्त उपयोगी हो सकता है । परीक्षा में यह पूछा जा सकता है कि किस धौति की महाधौति कहा गया है ? जिसका उत्तर है बहिष्कृत धौति । अतः विद्यार्थी इसे याद करलें ।

 

दन्तधौति के प्रकार

 

दन्तमूलं जिह्वामूलं रन्ध्रञ्च कर्णयुग्मयो: ।

कपालरन्ध्रम्पञ्चैतै: दन्तधौति: विधीयते ।। 26 ।।

 

भावार्थ :- दाँतों के मूल भाग अर्थात् उनकी जड़ों को साफ करना, जिह्वा के मूलभाग की सफाई करना, दोनों कानों के छिद्रों को साफ करना और सिर के अग्र ( ऊपरी ) भाग की शुद्धि करना यह दन्तधौति के पाँच प्रकार बताये गये हैं । जिनको क्रमशः दन्तमूल धौति, जिह्वामूल धौति, कर्णरन्ध्र धौति व कपालरंध्र धौति कहा जाता है ।

 

 

विशेष :- दन्तधौति के विषय में प्रायः बहुत सारे विद्यार्थियों में एक भ्रम की स्थिति बन जाती है कि दन्तधौति के कितने प्रकार होते हैं ? इसका उत्तर ऋषि घेरण्ड द्वारा इसके श्लोक में ही दिया गया है । जहाँ पर उन्होंने पञ्चैते शब्द का प्रयोग किया है । पञ्चैतेसंस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है पाँच । अतः यहाँ पर श्लोक में ही उन्होंने इसको स्पष्ट कर दिया है कि दन्तधौति के पाँच प्रकार होते हैं । लेकिन जैसे ही हम इनकी गणना करते हैं तो इनकी संख्या चार ( 4 ) मिलती है । असली भ्रम यहाँ से शुरू होता है । जिसका निवारण दन्तधौति के तीसरे स्थान पर दी गई धौति ( कर्णरन्ध्र धौति ) के ऊपर ध्यान देने मात्र से ही हो जाता है । कर्णरन्ध्र धौति में हमारे दोनों कानों को शामिल किया जाता है । जिससे इनकी संख्या पाँच होती है । वैसे यदि कर्णरन्ध्र धौति को एक मानते हैं तो यह चार ही दिखती हैं । लेकिन कर्णरन्ध्र में दोनों कानों की शुद्धि को शामिल किया गया है । जिससे दन्तधौति संख्या में कुल पाँच प्रकार की होती है । इसी प्रकार विद्यार्थी धौति के जब सभी प्रकारों की संख्या को गिनता है तो वह भी इसी गलती के कारण धौति के प्रकारों की कुल संख्या बारह ( 12 ) बताता है । जबकि वह कर्णरन्ध्र धौति के दूसरे अंग को भी इसमें शामिल करे तो धौति के प्रकारों की वास्तविक संख्या तेरह ( 13 ) होती है ।

 

 

दन्तमूल धौति

 

खादिरेण रसेनाथ मृत्तिकया च शुद्धया ।

मार्जयेद्दन्तमूलञ्च यावत्किल्बिषमाहरेत् ।। 27 ।।

 

भावार्थ :- खदिर ( खैर ) के वृक्ष से निकलने वाले रस व सूखी मिट्टी दोनों को आपस में मिलाकर उनके लेप को दाँतों के मूल भाग पर तब तक रगड़ते रहें जब तक कि दाँतों में लगी हुई गन्दगी ( मल ) पूरी तरह से दूर न हो जाए ।

 

 

विशेष :- यहाँ पर जिस सूखी मिट्टी की बात कही गई है । वह पूरी तरह से शुद्ध होनी चाहिए । इसके लिए चिकनी पीली मिट्टी का उपयोग करना सबसे उत्तम माना जाता है क्योंकि चिकनी पीली मिट्टी में किसी प्रकार का कोई दोष ( कीटाणु ) नहीं होता । हमें इसके लिए हमेशा एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिस मिट्टी का प्रयोग किया जाए । वह मिट्टी सभी प्रकार की कीटनाशक दवाइयों के प्रभाव से मुक्त होनी चाहिए ।

 

 

 

दन्तमूल धौति लाभ

 

 दन्तमूलं परा धौतिर्योगीनां योगसाधने ।

नित्यं कुर्यात् प्रभाते च दन्तरक्षां च योगवित् ।

दन्तमूलं धारणादिकार्येषु योगिनां मतम् ।। 28 ।।

 

भावार्थ :- योगी द्वारा की जाने वाली सभी योग साधनाओं में ( धौतियों में ) दन्तमूल धौति को श्रेष्ठ माना गया है । अपने दाँतों की रक्षा के लिए साधक को प्रतिदिन प्रातःकाल ( सुबह- सुबह ) दन्तमूल धौति का अभ्यास करना चाहिए । दन्तमूल धौति को योगियों द्वारा धारणीय कार्यों ( जिनको कार्यों को प्रतिदिन करना चाहिए ) में करने योग्य माना गया है ।

जिह्वामूल धौति लाभ

 

 अथात: सम्प्रवक्ष्यामि जिह्वाशोधनकारणम् ।

जरामरणरोगादीन् नाशयेद्दीर्घलम्बिका ।। 29 ।।

 

भावार्थ :- इसके बाद मैं जिह्वा ( जीभ ) को लम्बी करने वाली, बुढ़ापा, मृत्यु, सभी रोगों को नष्ट करने वाली व जिह्वा को शुद्ध करने वाले कारण अर्थात् विधि का वर्णन करूँगा ।

 

 

विशेष :- इस श्लोक में ऋषि घेरण्ड ने जिह्वामूल धौति की विधि से पहले ही उससे होने वाले लाभों का वर्णन किया है ।

 

 

जिह्वामूल धौति विधि

 

तर्जनीमध्यमान्तानां अङ्गुलित्रययोगत: ।

वेशयेद् गलमध्ये तु मार्जयेल्लम्बिका जडम् ।

शनै: शनैर्मार्जयित्वा कफदोषं निवारयेत् ।। 30 ।।

 

भावार्थ :- तर्जनी ( पहली अँगुली ), मध्यमा  ( दूसरी, सबसे बड़ी या बीच वाली अँगुली ) और अनामिका ( तीसरी अँगुली या रिंग फिंगर ) अँगुलियों को एकसाथ मिलाकर गले के बीच में स्थित जिह्वा के मूलभाग को धीरे- धीरे से रगड़ते हुए जीभ पर लगे मल ( गन्दगी ) को साफ करना चाहिए । इस प्रकार जीभ को शुद्ध करने से कफ विकार भी समाप्त होते हैं ।

 

 

विशेष :- जिह्वामूल धौति के लिए पहली तीन अँगुलियों से जीभ को रगड़कर साफ करने की बात कही गई है । हमारे हाथ की पहली अँगुली को तर्जनी, दूसरी को मध्यमा, तीसरी को अनामिका, चौथी को कनिष्का व अँगूठे को अँगुष्ठ कहा जाता है । यह सभी इनके संस्कृत नाम हैं ।

 

 

मार्जयेन्नवनीतेन दोहयेच्च पुनः पुनः ।

तदग्रं लौहयन्त्रेण कर्षयित्वा शनै: शनै: ।। 31 ।।

 

भावार्थ :- इसके उपरान्त जीभ के ऊपर मक्खन को रगड़कर बार- बार उसका दोहन ( उसे लम्बा ) करना चाहिए । फिर लोहे की चिमटी द्वारा जीभ के अग्र भाग ( अगले हिस्से ) को पकड़कर उसे धीरे- धीरे खीचना चाहिए ।

 

 

नित्यं कुर्यात् प्रयत्नेन रवेरुदयकेऽस्तके ।

एवं कृते च नित्यं सा लम्बिका दीर्घतां व्रजेत् ।। 32 ।।

 

भावार्थ :- साधक द्वारा प्रतिदिन सूर्योदय ( सूर्य के निकलते समय ) व सूर्यास्त ( सूर्य के छिपते समय ) के समय पर पूरे प्रयत्न ( मनोभाव ) के साथ इसका अभ्यास करने से जीभ की लम्बाई बढ़ जाती है ।

 

कर्ण धौति विधि व लाभ

 

 तर्जन्यनामिकायोगान्मार्जयेत् कर्णरन्ध्रयो: ।

नित्यमभ्यासयोगेन नादान्तरं प्रकाशयेत् ।। 33 ।।

 

भावार्थ :- तर्जनी ( पहली अँगुली ) व अनामिका ( तीसरी, रिंग फिंगर ) दोनों अँगुलियों को मिलाकर इनके अग्रभाग से दोनों कानों की सफाई करना कर्णरन्ध्र धौति कहलाती है । प्रतिदिन कर्णरन्ध्र धौति का अभ्यास करने से साधक के अन्दर आन्तरिक नाद प्रकट ( सुनाई देने ) होने लगता है ।

 

 

कपालरन्ध्र धौति विधि व लाभ

 

बद्धाङ्गुष्ठेन दक्षणे मार्जयेद् भालरन्ध्रकम् ।

निद्रान्ते भोजनान्ते न दिवान्ते च दिने दिने ।। 34 ।।

 

भावार्थ :- दायें हाथ के अँगूठे से सिर के ऊपरी भाग का ( जहाँ पर छोटे बच्चों के सिर में एक अत्यन्य नाजुक स्थान होता है जो निरन्तर धड़कता रहता है ) प्रतिदिन प्रातःकाल, भोजन करने के बाद व दिन के अन्त में अर्थात् सायंकाल मार्जन ( हल्की मालिश द्वारा उसे शुद्ध करना ) करना कपालरंध्र धौति कहलाता है ।

 

 

विशेष :- कपालरंध्र धौति का अभ्यास साधक को दिन में तीन बार करना चाहिए । जिसका क्रम इस प्रकार है :- प्रातःकाल, दोपहर के भोजन के बाद व सांयकाल में । परीक्षा की दृष्टि से यह अत्यन्त उपयोगी है । परीक्षा में इस प्रकार की बात पूछी जा सकती है कि कपालरंध्र धौति का अभ्यास दिन में कितनी बार करना चाहिए ? इसका उत्तर है तीन बार । इसके साथ ही यह भी पूछा जा सकता है कि किस अंग से कपाल की शुद्धि करनी चाहिए ? व सिर के किस हिस्से की शुद्धि करनी चाहिए ? जिनके उत्तर क्रमशः दायें हाथ का अँगूठा व सिर का ऊपरी भाग हैं । अतः इसे सभी विद्यार्थी नोट करलें ।

 

 

 

 कपालरंध्र धौति लाभ

 

 नाडी निर्मलतां याति दिव्यदृष्टि: प्रजायते ।

एवमभ्यासयोगेन कफदोषं निवारयेत् ।। 35 ।।

 

भावार्थ :- कपालरंध्र धौति का नियमित रूप से अभ्यास करने से साधक की सभी नाड़ियाँ निर्मल ( शुद्ध ) हो जाती हैं । दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है और सभी कफदोषों की समाप्ति हो जाती है ।

हृदय धौति के प्रकार

 

हृद्धौतिं त्रिविधां कुर्याद्दण्डवमनवाससा ।। 36 ।।

 

भावार्थ :- हृदय धौति को तीन प्रकार से किया जाता है :- 1. दण्ड ( दण्डधौति ), 2. वमन ( वमन धौति ), 3. वास ( वस्त्र धौति ) ।

 

 

दण्ड धौति विधि

 

रम्भादण्डं हरिद्दन्डं वेत्रदण्डं तथैव च ।

हृन्मध्ये चालयित्वा तु पुनः प्रत्याहरेच्छनै: ।। 37 ।।

 

भावार्थ :- केले के पत्तों के बीच के कोमल ( पाइपनुमा ) भाग से, हल्दी के पत्तों के बीच के कोमल ( पाइपनुमा ) भाग से या फिर वेंत के पत्तों के बीच के कोमल ( पाइपनुमा ) भाग को हृदय प्रदेश के बीच तक ( छाती के दोनों हिस्सो के बीचोंबीच ) ले जाकर पुनः उसे धीरे से बाहर निकालना दण्डधौति कहलाता है ।

 

 

विशेष :- दण्डधौति में बताई गई विधि को अच्छी प्रकार से समझने के लिए विद्यार्थी चित्र की सहायता ले सकते हैं । आजकल दण्डधौति के स्थान पर रबड़ की पाइप का प्रयोग किया जाता है । जिसे स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता ।

 

 

दण्ड धौति लाभ

 

कफपित्तं तथा क्लेदं रेचये दूर्ध्ववर्त्मना ।

दण्डधौतिविधानेन हृद्रोगं नाशयेद् ध्रुवम् ।। 38 ।।

 

भावार्थ :- दण्डधौति के अभ्यास से साधक के अन्दर कफ, पित्त व क्लेद ( दूषित चिपचिपा पदार्थ ) आदि की बढ़ी हुई मात्रा को शरीर के ऊपरी मार्ग ( मुहँ द्वारा ) बाहर निकाल दिया जाता है । जिससे साधक के हृदय से सम्बंधित सभी रोग निश्चित रूप से समाप्त हो जाते हैं ।

 

 

विशेष :- दण्डधौति से साधक के शरीर में कफ, पित्त व क्लेद ( दूषित चिपचिपा पदार्थ ) की अधिकता समाप्त हो जाती है । जिससे शरीर में इन सभी से सम्बंधित होने वाले रोगों की सम्भावना भी समाप्त हो जाती है ।

 

 

वमन धौति विधि व लाभ

 

भोजनान्ते पिबेद्वारि चाकण्ठ पूरितं सुधी: ।

उर्ध्वां द्रुष्टिं क्षणं कृत्वा तज्जलं वमयेत् पुनः ।। 39 ।।

नित्यामभ्यासयोगेन कफपित्तं निवारयेत् ।। 40 ।।

 

भावार्थ :- बुद्धिमान साधक द्वारा भोजन करने के बाद ( भोजन करने के लगभग

चार घण्टे बाद ) पानी को इतनी मात्रा में पीना चाहिए कि पानी गले तक भर जाए । इसके बाद कुछ पल तक साधक द्वारा ऊपर की ओर देखते हुए पुनः उस सारे पानी को बाहर निकाल देना चाहिए । यह वमन धौति कहलाती है । इस प्रकार वमन धौति का नियमित रूप से अभ्यास करने से साधक के कफ व पित्त से सम्बंधित सभी विकार ( रोग ) समाप्त हो जाते हैं ।

 

 

विशेष :- इस श्लोक में वमन धौति की विधि में लिखा है कि साधक को भोजन के बाद पानी पीकर उसे निकाल देना चाहिए । इसके विषय में सभी योग आचार्यों के अलग- अलग मत हैं । एक मत के अनुसार तो साधक को भोजन करने के तुरन्त बाद पानी पीकर इस क्रिया को करना चाहिए । यह क्रिया इसलिए न्यायसंगत नहीं लगती है क्योंकि ऐसा करने से तो सारा भोजन बाहर निकल जाएगा । साथ ही इस विधि का अभ्यास नियमित रूप से करने की बात कही गई है । जिससे इस विधि पर घोर शंका होती है । प्रतिदिन यदि ऐसा किया जाएगा तो शरीर अत्यंय कमजोर पड़ जाएगा । जब तक शरीर को पोषण के रूप में आहार प्राप्त नहीं होगा तो निश्चित रूप से उसका ( शरीर )  नाश हो जाएगा । इसलिए यहाँ पर ऋषि घेरण्ड इस प्रकार का कथन नहीं कह रहे हैं । इससे सम्बंधित एक अन्य क्रिया भी की जाती है जिसे आधुनिक योग आचार्यों ने व्याघ्र क्रिया का नाम दिया है । व्याघ्र क्रिया के प्रयोग के पीछे एक विशेष प्रयोजन होता है । कई बार हम गलती से गरिष्ठ, दूषित या ज्यादा मात्रा में भोजन ग्रहण कर लेते हैं । जिससे शरीर में नुकसान होने का खतरा बढ़ जाता है । उस खतरे से बचने के लिए व्याघ्र क्रिया का अभ्यास किया जाता है । इसे व्याघ्र क्रिया का नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि शेर भी इसी प्रकार करता है । जब कई बार शेर अत्यधिक मात्रा में किसी प्राणी के मांस का सेवन कर लेता है तो वह उसको उल्टी करके बाहर निकाल देता है । ठीक उसी तर्ज पर इसे व्याघ्र क्रिया का नाम दिया गया है ।

 

अब इसके बाद कुछ योग आचार्यों का मानना है कि भोजन के बाद का अर्थ है भोजन करने के कम से कम चार घण्टे बाद इस क्रिया को करना चाहिए । ऐसा इसलिए कहा गया है कि भोजन को पचने में कम से कम तीन से चार घण्टे का समय लगता है । इसके बाद ( 3- 4 घण्टे ) बाद भी भोजन का जो अंश ( भाग ) नहीं पचा है । वह शरीर के अन्दर अपच को बढ़ाकर शरीर में अनेक प्रकार के विष उत्पन्न करता है । इसलिए उस बिना पचे हुए भोजन के अंश को वमन धौति के द्वारा बाहर निकाला जाता है । यह विधि पूरी तरह से तर्कपूर्ण व न्यायसंगत लगती है । इसलिए सभी साधक अपने विवेक से भी इसका विश्लेषण करें ।

 

 

वासधौति / वस्त्र धौति विधि

 

चतुरङ्गुलविस्तारं सूक्ष्मवस्त्रं शनैर्ग्रसेत् ।

पुनः प्रत्याहरेदेतत्प्रोच्यते धौतिकर्मकम् ।। 41 ।।

 

भावार्थ :- चार अँगुल चौड़ा बारीक कपड़ा लेकर उसे धीरे- धीरे गले से नीचे निगलते हुए अन्दर ले जाएं । उसके बाद पुनः उस कपड़े को धीरे- धीरे ही बाहर निकालें । इस क्रिया को वस्त्र धौति कहते हैं ।

 

 

विशेष :-  इसके लिए एक हल्के बारीक सूती वस्त्र का प्रयोग किया जाता है । जिसकी चौड़ाई चार अँगुलियों के बराबर ( लगभग तीन इंच ) होती है और लम्बाई लगभग बाईस फीट होती है ( हठ प्रदीपिका के अनुसार ) । इसके लिए सर्वप्रथम साधक कागासन में बैठें और उसके बाद उस कपड़े की गोल पट्टी बनाकर उसे गुनगुने पानी में भिगो ले । फिर धीरे- धीरे उसे मुँह द्वारा अन्दर निगलना होता है । इसमें साधक को सावधानी रखनी चाहिए कि सूती वस्त्र को दाँतों से बचा कर रखे । वस्त्र धौति को ज्यादा समय तक पेट के अन्दर नहीं रखना चाहिए । पाँच मिनट के अन्दर ही उसे बाहर निकालना शुरू कर देना चाहिए अन्यथा शरीर के अन्दर धौति के पचने की क्रिया शुरू हो सकती है । जिससे बहुत हानि हो सकती है । अतः साधक इसका अभ्यास सदा योग्य गुरु की देखरेख में ही करे ।

 

 

वासधौति / वस्त्र धौति लाभ

 

गुल्मज्वरप्लीहकुष्ठं कफपित्तं विनश्यति ।

आरोग्यं बलपुष्टिश्च भवेत्तस्य दिने दिने ।। 42 ।।

 

भावार्थ :- वस्त्र धौति के अभ्यास से शरीर के सभी वायु विकार ( गैस्टिक ), ज्वर ( बुखार ), प्लीहा ( स्प्लीन ), चर्म व कुष्ठ रोग ( त्वचा रोग ) व कफ और पित्त के असन्तुलन से होने वाले सभी रोगों का नाश हो जाता है । जिससे शरीर में आरोग्यता, मजबूती और शक्ति ( ताकत ) का प्रभाव दिन प्रतिदिन बढ़ता रहता है ।

बस्ति क्रिया के प्रकार

 

बस्ति क्रिया को षट्कर्म का दूसरा अंग माना है । इस क्रिया में हम अपने गुदा प्रदेश द्वारा अपनी बड़ी आँत की शुद्धि करते हैं । बस्ति से ठीक पहले धौति क्रिया के अन्तिम अंग के रूप में मूलशोधन क्रिया के द्वारा भी हम अपनी गुदा की सफाई करते हैं । मूलशोधन से केवल गुदा प्रदेश की ही सफाई हो पाती है बड़ी आँत की नहीं । अत: इसी बात को ध्यान में रखते हुए महर्षि घेरन्ड अगले ही सूत्र में बस्ति क्रिया का उपदेश करते हैं । जिससे साधक गुदा प्रदेश के साथ- साथ अपनी बड़ी आँत की भी सफाई कर सकें ।

 

घेरन्ड संहिता में बस्ति क्रिया के दो प्रकार बताएं हैं । जो इस प्रकार हैं-

 

जलबस्ति: शुष्कबस्तिर्बस्ति: स्याद् द्विविधा स्मृता ।

जलबस्तिं जले कुर्याच्छुकबस्तिं सदा क्षितौ ।। 46 ।।

अर्थ :- यह बस्ति क्रिया दो प्रकार की होती है । एक जल बस्ति और दूसरी शुष्क बस्ति । जल बस्ति का अभ्यास जल में तथा शुष्क बस्ति का अभ्यास भूमि अर्थात् जमीन पर बैठकर किया जाता है ।

 

 

विशेष :- बस्ति के दो प्रकार माने गए हैं । एक जलबस्ति और दूसरा स्थलबस्ति ।

 

जलबस्ति विधि

 

नाभिमग्नजले पायुं न्यस्तवानुत्कटासनम् ।

आकुञ्चनं प्रसारञ्च जलंबस्तिं समाचरेत् ।। 47 ।।

 

भावार्थ :- उत्कटासन लगाकर जल में नाभि प्रदेश तक बैठ जाएं । उसके बाद गुदा द्वार का आकुञ्चन ( गुदा को अन्दर की ओर खीचना ) व प्रसारण ( गुदा को बाहर की तरफ फैलाना ) करते हुए जलबस्ति क्रिया का अभ्यास करना चाहिए ।

 

विशेष :- जलबस्ति क्रिया में साधक को अश्वनी मुद्रा ( गुदा का आकुञ्चन व प्रसारण ) का अभ्यास करना चाहिए । परीक्षा की दृष्टि से इसमें मुख्य रूप से पूछा जा सकता है कि जलबस्ति क्रिया को करते हुए किस आसन का प्रयोग किया जाता है ? जिसका उत्तर है उत्कटासन । साथ ही यह भी पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा का प्रयोग करने से जलबस्ति करने में शीघ्र ही सफलता प्राप्त होती है ? जिसका उत्तर है अश्वनी मुद्रा । इसके लिए साधक को पानी के ऐसे टब में बैठना चाहिए जिसमें पानी उसकी नाभि तक आसानी से पहुँच सके । इससे कम या ज्यादा पानी नहीं होना चाहिए । साथ ही पानी स्वच्छ व अनुकूल तापमान वाला होना चाहिए । न अधिक ठण्डा और न अधिक गर्म ।

 

जलबस्ति के लाभ

 

प्रमेहञ्च उदावर्तं क्रूरवायुं निवारयेत् ।

भवेत्स्वच्छन्ददेहश्च कामदेवसमो भवेत् ।। 48 ।।

 

भावार्थ :- जल बस्ति क्रिया से प्रमेह ( शरीर से आवश्यक धातुओं का मूत्र मार्ग से निकलना ) उदावर्त अर्थात् वायु की अधिकता से शरीर में होने वाला भारीपन , वायु की क्रूरता अर्थात् तीव्रता से होने वाले रोग ( सर दर्द, गैस, डकार व शरीर में भारीपन आदि ) समाप्त होते हैं । इसके साथ ही साधक का शरीर स्वच्छ ( रोग रहित ) व कामदेव के समान सुन्दर व आकर्षित हो जाता है ।

 

स्थलबस्ति विधि

बस्ति: पश्चिमोत्तानेन चालयित्वा शनैरध: ।

अश्विनीमुद्रया पायुमाकुञ्चयेत् प्रसारयेत् ।। 49 ।।

 

भावार्थ :- भूमि पर पश्चिमोत्तानासन में बैठकर अश्वनी मुद्रा द्वारा गुदा प्रदेश को धीरे- धीरे चलाते हुए उसका आकुञ्चन ( गुदा को सिकोड़ना ) व प्रसारण ( गुदा प्रदेश को बाहर की ओर फैलाना ) करने की क्रिया को स्थलबस्ति कहते हैं ।

 

 

विशेष :- स्थलबस्ति का अभ्यास पश्चिमोत्तान आसन में बैठकर किया जाता है । इसके साथ ही इसमें अश्वनी मुद्रा का अभ्यास भी किया जाता है ।

 

 स्थलबस्ति के लाभ

 

एवमभ्यासयोगेन कोष्ठदोषो न विद्यते ।

विवर्द्धयेज्जठराग्निमामवातं विनाशयेत् ।। 50 ।।

 

भावार्थ :- इस प्रकार स्थल बस्ति का अभ्यास करने से साधक के कोष्ठबद्धता ( कब्ज ) आदि पेट सम्बन्धी रोग समाप्त हो जाते हैं । इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है । जिसके कारण शरीर में आमवात ( खाना खाने के बाद शौच का दबाव बनना ) रोग भी नष्ट हो जाते हैं ।

नेति क्रिया

 

यह षट्कर्म का तीसरा अंग है । नेति क्रिया द्वारा हमारे शीर्ष प्रदेश ( शरीर का ऊपरी भाग ) की शुद्धि होती है । जिसमें हमारी आँखों, नाक, कान व गले की शुद्धि होती है । यहाँ पर भी हठ प्रदीपिका की तरह ही नेति के एक ही प्रकार का वर्णन किया गया है ।

 

 

वितस्तिमानं सूक्ष्मसूत्रं नासानाले प्रवेशयेत् ।

मुखान्निर्गमयेत्पश्चात् प्रोच्यते नेतिकर्मकम् ।। 51 ।।

भावार्थ :- एक बिता लम्बा अर्थात् लगभग आधा हाथ लम्बा ( लगभग 12 अँगुल लम्बा ) पतले सूती धागों के समूह ( कई सारे सूती धागे ) लेकर उसे नासिका के एक भाग से अन्दर डालकर उसे मुहँ द्वारा बाहर निकाल देने को की प्रक्रिया को नेति क्रिया कहा जाता है ।

 

 

विशेष :- जब भी हम नेति के विषय में किसी से बात करते हैं तो सामान्य रूप से नेति के तीन या चार प्रकार सुनने को मिलते हैं । जिनमें जलनेति, सूत्रनेति, रबड़नेति, घृतनेति आदि आदि । जबकि हठयोग के किसी भी ग्रन्थ में इनका वर्णन नहीं किया गया है । नेति के रूप में केवल सूत्र नेति को ही मान्यता मिली है । यहाँ पर हम नेति के सम्बंध में उत्पन्न होने वाले सभी सन्देहों का निवारण करने का प्रयास करेंगे ।

 

जलनेति :- जलनेति में जल के द्वारा नासिका मार्ग की शुद्धि की जाती है । लेकिन किसी हठयोग के ग्रन्थ में इसका वर्णन नहीं मिलता । नेति के इस प्रकार की का निर्देशन कुछ आधुनिक योग आचार्यों ने किया है । उनका मानना है कि सूत्रनेति से पहले यदि साधक जलनेति का अभ्यास करता है तो उसे सूत्रनेति करने में आसानी होगी । उन्होंने जलनेति को सूत्रनेति के पूर्व कर्म ( प्री वर्कआउट ) के रूप में माना है । जो कि पूरी तरह से न्याय संगत है । जिस प्रकार सूर्य नमस्कार व आसन करने से पूर्व साधक अपने शरीर को गर्माने ( वार्मिंग -अप ) के लिए कुछ सूक्ष्म क्रियाओं का अभ्यास करता है । ताकि कठिन अभ्यास करने से पहले उसका शरीर अच्छी तरह से तैयार हो सके । ठीक इसी प्रकार जलनेति को भी सूत्रनेति से पहले किया जाने वाली क्रिया माना जाता है । इससे साधक अपनी नासिका को सूत्रनेति करने के लिए अच्छी तरह से तैयार कर लेता है । साथ ही जलनेति करने से साधक को सूत्रनेति से मिलने वाले कुछ लाभ भी मिलते हैं । अतः आधुनिक योग आचार्यों द्वारा निर्देशित यह अभ्यास करने योग्य है ।

 

रबड़नेति :- रबड़नेति को भी नेति क्रिया के एक प्रकार के रूप में प्रयोग किया जाता है । जिसमें साधक एक रबड़ की पतली पाइप द्वारा नासिका मार्ग की शुद्धि करता है । कुछ योग आचार्यों ने इसे सूत्रनेति के विकल्प के रूप में प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया है । रबड़नेति के विषय में मेरा मत थोड़ा अलग है । मैं व्यक्तिगत रूप से रबड़नेति करने के पक्ष में नहीं हूँ । रबड़नेति के अभ्यास से साधक को लाभ की बजाय हानि होती है । इसके पीछे मेरे दो- तीन तर्क हैं । आप भी यदि इन तर्कों पर विचार करेंगे तो आपको भी ऐसा ही प्रतीत होगा ।

 

1.      रबड़नेति का निर्माण रबड़ से होता है । रबड़ की किसी भी वस्तु या पदार्थ को बनाते हुए कई तरह के कैमिकलों का प्रयोग किया जाता है । जो कि स्वास्थ्य के लिए सौ प्रतिशत हानिकारक होते हैं । जब भी आप रबड़नेति को नाक द्वारा सूँघने का प्रयास करेंगे तो आपको उसमें से एक अजीब प्रकार की दुर्गन्ध आएगी । वह दुर्गन्ध उन कैमिकलों की होती है जिनसे उस रबड़नेति का निर्माण हुआ है । अब आप सोचें कि जिस व्यक्ति को पहले से ही एलर्जी की समस्या है । यदि वह रबड़नेति का अभ्यास करता है तो क्या रबड़नेति के कैमिकल से उसकी एलर्जी नहीं बढ़ेगी ? क्या वह रबड़नेति नाक जैसे अति संवेदनशील अंग के अन्दर जाने पर अपना दुष्प्रभाव नहीं दिखाएगी ?

 

2.      दूसरा रबड़नेति के बनने के बाद उसके ऊपर लाल रंग की परत चढ़ाई जाती है । अब आप ररंग बनाने की विधि के विषय में जानकारी हासिल करोगे तो आपको पता चलेगा कि कोई भी रंग बिना कैमिकल के बन ही नहीं सकता । इससे पता चलता है कि रबड़नेति के निर्माण में एक बार नहीं बल्कि दो- दो बार विभिन्न प्रकार के कैमिकलों का प्रयोग किया जाता है । अब आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि नासिका जैसे अति संवेदनशील अंग जो थोड़ी सी प्रतिकूल गन्ध को सूँघने पर ही जहाँ से छीकें आना शुरू हो जाती हैं । वहाँ पर इतने कैमिकलों से तैयार की गई रबड़नेति का क्या असर पड़ता होगा ?

3.      तीसरा रबड़नेति को कई बार प्रयोग करने से उसकी मजबूती भी कम होने लगती है । जिससे उसके टूटने की आशंका ज्यादा हो जाती है । साथ ही सर्दी के मौसम में रबड़ में अकड़न आ जाती है । उससे भी उसका टूटने का खतरा बढ़ जाता है । दोनों ही कारणों से रबड़नेति करते समय उसके बीच में से टूटने का खतरा लगातार बना रहता है । जिससे साधक को किसी भी प्रकार की हानि हो सकती है ।

ऊपर वर्णित कारणों से मुझे लगता है कि रबड़नेति का प्रयोग योग साधकों के लिए हितकारी नहीं है ।

 

घृत, तेल व दुग्धनेति :- हमें बहुत बार घृत व दुग्धनेति के विषय में भी सुनने को मिलता है । इनमें से घृत नेति को हितकारी माना जा सकता है । क्योंकि घृत से नासिका मार्ग का संचालन सरल हो जाता है । जिससे कफ की निवृत्ति होती है, आँखों की रोशनी भी बढ़ती है और साथ ही सिर दर्द व माइग्रेन जैसी जटिल समस्या भी समाप्त हो जाती है । लेकिन यहाँ पर घृतनेति का अर्थ यह बिलकुल भी नहीं है कि जलनेति की तरह ही घृतनेति में घी का प्रयोग किया जाता है । घृतनेति में गुनगुने शुद्ध देसी घी की दो चार बूंदें ही नाक में डाली जाती हैं । जिसको हम रात को सोने करते हैं तो इसका ज्यादा लाभ मिलता है । दूसरा कुछ व्यक्ति तेल नेति भी करते हैं । जिसकी विधि बिलकुल घृतनेति की तरह ही होती है । यह भी घृतनेति की भाँति ही लाभ देने वाली होती है ।  इसके साथ ही हम दुग्धनेति की भी बात करते हैं । दुग्धनेति में यही क्रिया दूध के साथ कि जाती है । इस क्रिया को भी ज्यादा हितकारी नहीं माना जाता है । इस क्रिया में लाभ की बजाय हानि होने की संभावना ज्यादा होती है ।

 

अतः मेरे मतानुसार जलनेति, सूत्रनेति व घृत अथवा तेलनेति करने से साधक को कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं । वहीं रबड़नेति व दुग्धनेति करने पर हानि होने की प्रबल संभावना रहती है । इसके साथ ही यह बात भी स्पष्ट हो गई है कि हठ प्रदीपिका व घेरण्ड संहिता में नेति क्रिया के एक ही प्रकार का वर्णन किया गया है । जिसे सूत्रनेति कहा जाता है । अन्य सभी प्रकार आधुनिक योग आचार्यों के अपने निजी मत हैं ।

 

नेति क्रिया के लाभ

 

साधनान्नेतियोगस्य खेचरीसिद्धि माप्नुयात् ।

कफदोषा विनश्यन्ति दिव्यदृष्टि: प्रजायते ।। 52 ।।

भावार्थ :- नेति क्रिया की साधना से योगी की खेचरी मुद्रा सिद्ध होती है । इसके साधक के सभी प्रकार के कफ रोगों का नाश होता है और उसे दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है ।

लौलिकी / नौलि क्रिया विधि व लाभ

 

लौलिकी शब्द लोल शब्द से बना है । जिसका अर्थ है पेट को घुमाना । लौलिकी को नौलि क्रिया भी कहा जाता है । यह षट्कर्म का चौथा अंग है । इससे हमारे पांचन तन्त्र की शुद्धि होती है । यह हमारे पांचन संस्थान के सभी आन्तरिक अंगों को मजबूत करने का काम करती है ।

 

अमन्दवेगेतुन्दञ्च भ्रामयेदुभपार्श्वयो: ।

सर्वरोगान्निहन्तीह देहानलविवर्द्धनम् ।। 53 ।।

भावार्थ :- पेट को पूरी तेज गति के साथ दोनों तरफ ( दायें से बायीं व बायें से दायीं ओर ) घुमाना लौकिकी अर्थात् नौलि क्रिया कहलाती है । इसके निरन्तर अभ्यास से यह साधक के सभी रोगों का नाश करती है । इसके साथ ही यह शरीर में स्थित जठराग्नि को बढ़ाती है । जिससे साधक का पाचन तंत्र मजबूत होता है ।

 

 

विशेष :- नौलि के विषय में कुछ आचार्यों ने इसके चार प्रकारों का वर्णन करके एक नये विवाद को जन्म दे दिया है कि नौलि के कितने प्रकार माने गए हैं ? अब यदि हम हठयोग के ग्रन्थों के अनुसार इसका उत्तर देखते हैं तो पता चलता है कि नौलि के एक ही प्रकार का वर्णन ग्रन्थकारों ने किया है । जबकि हम किसी से भी इस विषय में पूछते हैं तो हमें इसका उत्तर चार मिलता है । अब प्रश्न यह उठता है कि इसका वास्तविक उत्तर क्या होना चाहिए ? यदि हम इसे ग्रन्थों के अनुसार देखते हैं तो इसका उत्तर हमें यही मिलता है कि नौलि एक ही प्रकार की होती है । इसके चार प्रकारों का वर्णन आधुनिक योग आचार्यों ने अपने मतानुसार किया है । जो अपनी जगह बिलकुल सही व सटीक है । लेकिन उसको इस प्रकार से प्रस्तुत किया गया है कि हठयोग के ग्रन्थों के अनुसार भी इसके चार ही प्रकार हैं । जबकि ऐसा नहीं है । अतः मेरा उन सभी आचार्यों से अनुरोध है कि इन सभी प्रकारों को अपना निजी मत बताकर विषय को स्पष्ट करने का कष्ट करें । ताकि विद्यार्थियों में किसी भी प्रकार की कोई भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो ।

 

त्राटक क्रिया

 

त्राटक क्रिया को महर्षि घेरन्ड ने षट्कर्म के पाँचवें अंग के रूप में माना है । यह मुख्य रूप से हमारे नेत्रों ( आँखों ) की शुद्धि करता है । साथ ही एकाग्रता के लिए भी यह अति महत्त्वपूर्ण होता है ।

 

निमेषोन्मेषकं त्यक्त्वा सूक्ष्मलक्ष्यं निरीक्षयेत् ।

पतन्ति यावदश्रूणि त्राटकं प्रोच्यते बुधै: ।। 54 ।।

भावार्थ :- आँखों को खोलने और बन्द करने की प्रक्रिया को रोककर, एक सूक्ष्म लक्ष्य की तरफ तब तक टकटकी लगाकर देखते रहना चाहिए जब तक कि आँखों से आंसू न बहने लगें । इस क्रिया को विद्वानों ने त्राटक कहा है ।

 

 

विशेष :- त्राटक का अभ्यास करते हुए साधक किसी भी एक लक्ष्य की ओर ध्यान लगा सकता है । उसमें दीपक, मोमबत्ती की लौ अथवा कोई एक छोटे बिन्दु आदि कुछ भी हो सकता है ।

कुछ आधुनिक योग आचार्यों ने त्राटक के तीन भेद किये हैं । जो इस प्रकार हैं :- 1. बाह्य त्राटक, 2. आभ्यंतर त्राटक, 3. अधोत्राटक । ये त्राटक के प्रकार किसी एक आचार्य के अनुसार हो सकते हैं । लेकिन इनका वर्णन हठयोग के किसी ग्रन्थ ( हठ प्रदीपिका व घेरण्ड संहिता ) में नहीं किया गया है । जब भी मैं किसी विद्यार्थी से पूछता हूँ कि त्राटक के कितने प्रकारों का वर्णन हठ प्रदीपिका अथवा घेरण्ड संहिता में किया गया है ? तो ज्यादातर विद्यार्थी कहते हैं कि हठ प्रदीपिका व घेरण्ड संहिता में त्राटक के तीन प्रकारों का वर्णन किया गया है । जिनमें वह ऊपर वर्णित तीनों प्रकारों को ही बताते हैं । जबकि यह गलत उत्तर है । इसके पीछे मैं यह नहीं कहना चाहता कि उन आचार्यों द्वारा बताए गए त्राटक के तीन प्रकार गलत है या उनका कोई औचित्य नहीं है । बल्कि मैं यहाँ पर सभी विद्यार्थियों को यह बताने का प्रयास कर रहा हूँ कि हठ प्रदीपिका व घेरण्ड संहिता में त्राटक के केवल एक ही प्रकार का वर्णन किया गया है तीन प्रकारों का नहीं । त्राटक के तीन प्रकार किसी आचार्य का अपना स्वयं का मत हो सकता है । इसी प्रकार नौलि के सम्बन्ध में भी कई आचार्यों का मानना है कि नौलि के चार प्रकार होते हैं । लेकिन हठ प्रदीपिका व घेरण्ड संहिता दोनों ही ग्रन्थों में नौलि के एक ही प्रकार का वर्णन किया गया है । नौलि के चार प्रकार का मत किसी आचार्य का निजी मत हो सकता है । उसको स्वामी स्वात्माराम व महर्षि घेरण्ड का मत बताकर विद्यार्थियों को  भ्रमित करना बिलकुल अनुचित है । जिस प्रकार मैंने नेति क्रिया के प्रकरण में अपना मत बता कर रबड़नेति को हानिकारक बताया है । साथ ही जलनेति, घृतनेति, तेलनेति व दुग्धनेति के बारे में अपना मत स्पष्ट किया है । वह मेरा अपना मत है । उसका हठ प्रदीपिका व घेरण्ड संहिता से कोई लेना देना नहीं है ।

 

ठीक उसी प्रकार यहाँ पर भी योग के आधुनिक आचार्यों को इस प्रकार किसी भी क्रिया के प्रकार बताते हुए यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह हमारा मत अथवा विचार है । ऐसा करने से विद्यार्थियों में किसी प्रकार का कोई संशय नहीं रहेगा । जिससे परीक्षा के समय पर वह यौगिक ग्रन्थों के अनुसार ही प्रश्न का सही उत्तर देंगे । इससे किसी तरह का कोई सन्देह नहीं रहेगा ।

 

त्राटक क्रिया के लाभ

एवमभ्यासयोगेन शाम्भवी जायते ध्रुवम् ।

नेत्ररोगा विनश्यन्ति दिव्यदृष्टि: प्रजायते ।। 55 ।।

 

भावार्थ :- त्राटक क्रिया के अभ्यास से योगी को निश्चित रूप से शाम्भवी मुद्रा की प्राप्ति होती है । सभी नेत्र रोग समाप्त होते हैं और साथ ही दिव्य दृष्टि भी प्राप्त होती है ।

 

 

विशेष :- परीक्षा की दृष्टि से त्राटक के सम्बन्ध में यह पूछा जा सकता है कि त्राटक क्रिया के फल के रूप में साधक को कौन सी मुद्रा की सिद्ध प्राप्त होती है ? जिसका उत्तर शाम्भवी मुद्रा है ।

कपालभाति क्रिया के प्रकार

 

भालभाति का व्यवहारिक नाम कपालभाति है । सभी व्यक्ति इसे कपालभाति के नाम से ही जानते हैं । लेकिन महर्षि घेरण्ड ने इसे भालभाति कहकर संबोधित किया है । भाल का अर्थ है ललाट या चेहरा’ । और कपाल का अर्थ भी ललाट या चेहरा ही होता है । इसलिए भालभाति को कपालभाति कहा जाता है ।

 

कपालभाति के विषय में प्रचलित धारणाएं :-

 

कपालभाति के विषय में कुछ लोगों को सन्देह है कि यह षट्कर्म की क्रिया की बजाय एक प्राणायाम है । ऐसा मानने वालों के लिए यह समझ लेना बहुत ही आवश्यक है कि हठयोग के ग्रन्थों के अनुसार कपालभाति प्राणायाम नहीं बल्कि एक क्रिया है । यदि यह प्राणायाम होता तो महर्षि घेरण्ड इसका वर्णन कुम्भक ( प्राणायाम ) के अध्याय में करते जबकि उन्होंने इसका वर्णन षट्कर्म के रूप में किया है ।

 

दूसरा इसके जो तीन भेद किए गए हैं, उनमें से पहले अर्थात वातक्रम कपालभाति की जो विधि बताई गई है । कुछ उस विधि के कारण इसे प्राणायाम मानते हैं । क्योंकि वातक्रम कपालभाति में अनुलोम- विलोम की तरह श्वास को लेने व छोड़ने की विधि बताई गई है । लेकिन उसका वर्णन पहले इसलिए किया गया है ताकि व्युत्क्रम और शीतक्रम की क्रिया ठीक ढंग से हो पाए । पानी को नासिका से मुँह द्वारा और मुँह से नासिका द्वारा निकालने से पहले उसकी सफाई होना जरूरी है । जो कि वातक्रम कपालभाति द्वारा होती है ।

 

 

कपालभाति को प्राणायाम समझने के पीछे सबसे प्रमुख कारण योग गुरु स्वामी रामदेव द्वारा करवाया जाने वाला कपालभाति प्राणायाम है । जब स्वामी रामदेव प्राणायाम का क्रम शुरू करते हैं, तो वह सबसे पहले कपालभाति प्राणायाम करवाते हैं । जिसकी विधि षट्कर्म वाले कपालभाति से बिलकुल अलग है । लेकिन बहुत सारे व्यक्ति षट्कर्मों में वर्णित कपालभाति को स्वामी रामदेव द्वारा बताया गया प्राणायाम समझने की भूल करते हैं । जबकि उस कपालभाति व षट्कर्म के कपालभाति में बहुत ज्यादा अन्तर है ।

ऊपर वर्णित तर्कों से हमने कपालभाति के सम्बंध में विभिन्न मतों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है । जिससे विद्यार्थियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो ।

 

कपालभाति परिचय :- कपालभाति षट्कर्म की छटी व अन्तिम क्रिया है । जिसके तीन प्रकार है

 

वातक्रमेण व्युत्क्रमेण शीत्क्रमेण विशेषतः ।

भालभातिं त्रिधा कुर्यात्कफदोषं निवारयेत् ।। 56 ।।

 

भावार्थ :- भालभाति ( कपालभाति ) क्रिया के वातक्रम, व्युत्क्रम व शीतक्रम नामक तीन विशेष प्रकार हैं । जिनका अभ्यास करने से साधक के सभी कफ रोगों का निवारण ( समाप्त ) हो जाता है ।

 

 

विशेष :- घेरण्ड संहिता में कपालभाति क्रिया के तीन प्रकारों का वर्णन किया गया है । जिनका क्रम इस प्रकार है :- 1. वातक्रम कपालभाति, 2. व्युत्क्रम कपालभाति, 3. शीतक्रम कपालभाति ।

 

वातक्रम कपालभाति

 

 इडया पूरयेद्वायुं रेचयेत्पिङ्गलया पुनः ।

पिङ्गलया पूरयित्वा पुनश्चन्द्रेण रेचयेत् ।। 57 ।।

 

भावार्थ :- इड़ा नाड़ी ( बायीं नासिका ) से श्वास को अन्दर भरें और पिंगला नाड़ी ( दायीं नासिका ) से श्वास को बाहर निकाल दें । फिर पिंगला नाड़ी ( दायीं नासिका ) से श्वास को अन्दर भरकर इड़ा नाड़ी ( बायीं नासिका ) से श्वास को बाहर निकाल देना ही वातक्रम कपालभाति होता है ।

 

 

विशेष :- इडा नाड़ी का अर्थ बायीं नासिका व सूर्य नाड़ी का अर्थ दायीं नासिका होता है ।

 

वातक्रम कपालभाति के लाभ

 

 पूरकं रेचकं कृत्वा वेगेन न तु चालयेत् ।

एवमभ्यास योगेन कफदोषं निवारयेत् ।। 58 ।।

 

भावार्थ :- इस पूरक ( श्वास को अन्दर लेना ) व रेचक ( श्वास को बाहर छोड़ना ) क्रिया को कभी भी तेज गति के साथ नहीं करना चाहिए । इस प्रकार सहज रूप से करने पर यह सभी कफ दोषों का निवारण करता है ।

 

 

व्युत्क्रम कपालभाति विधि व लाभ

 

 नासाभ्यां जलमाकृष्य पुनर्वक्त्रेण रेचयेत् ।

पायं पायं व्युत्क्रमेण श्लेषमादोषं निवारयेत् ।। 59 ।।

 

भावार्थ :- नासिका के दोनों छिद्रों से पानी को पीकर मुहँ द्वारा बाहर निकाल दें और फिर उल्टे क्रम में ही मुहँ द्वारा पानी पीकर दोनों नासिका छिद्रों से पानी को बाहर निकाल दें । इस व्युत्क्रम कपालभाति द्वारा साधक के सभी कफ जनित रोगों का नाश होता है ।

 

 

विशेष :- व्युत्क्रम का अर्थ होता है उल्टा कर्म । इसके नाम से ही विद्यार्थी इसकी विधि को याद रख सकते हैं । हम नासिका द्वारा वायु और मुहँ द्वारा पानी पीते हैं । लेकिन व्युत्क्रम होने के कारण इसमें नासिका द्वारा पानी पीकर मुहँ से निकालना और फिर पुनः मुहँ द्वारा पानी पीकर नासिका द्वारा बाहर निकालना होता है । तभी इसका नाम व्युत्क्रम कपालभाति है ।

 

 

शीतक्रम कपालभाति विधि व लाभ

 

शीत्कृत्य पीत्वा वक्त्रेण नासानालैर्विरेचयेत् ।

एवमभ्यासयोगेन कामदेवसमो भवेत् ।। 60 ।।

 

भावार्थ :- शीत्कार की आवाज करते हुए मुहँ द्वारा पानी पीकर नासिका के दोनों छिद्रों से बाहर निकाल दें । यह प्रक्रिया शीतक्रम कपालभाति कहलाती है । इसका अभ्यास करने से योगी का शरीर कामदेव की भाँति अत्यंत सुन्दर हो जाता है ।

 

न जायते वार्द्धकं च ज्वरा नैव प्रजायते ।

भवेत्स्वच्छन्ददेहश्च कफदोषं निवारयेत् ।। 61 ।।

 

भावार्थ :- शीतक्रम के अभ्यास से व्यक्ति में कभी भी बुढ़ापा नहीं आता है और न उसके शरीर में कभी जीर्णता ( दुर्बलता ) आती है । इसके अलावा साधक का सम्पूर्ण शरीर स्वच्छ ( दोष रहित ) रहता है और उसके सभी कफ दोषों का भी निवारण हो जाता है ।

 

 

 

    ।। इति प्रथमोपदेश: समाप्त: ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

द्वितीय अध्याय ( आसन वर्णन )

घेरण्ड संहिता के दूसरे अध्याय में सप्तांग योग के दूसरे अंग अर्थात् आसन का वर्णन किया गया है । घेरण्ड ऋषि ने आसनों के बत्तीस ( 32 ) प्रकारों को माना है । घेरण्ड संहिता के अनुसार आसन करने से साधक के शरीर में दृढ़ता ( मजबूती ) आती है । अब आसनों के क्रम को प्रारम्भ करते हैं ।

 

 

आसनानि समस्तानि यावन्तो जीवजन्तव: ।

चतुरशीतिलक्षाणि शिवेन कथितानि च ।। 1 ।।

तेषां मध्ये विशिष्टानि षोडशोनं शतं कृतम् ।

तेषां मध्ये मर्त्यलोके द्वात्रिंशदासनं शुभम् ।। 2 ।।

 

 

भावार्थ :- इस पृथ्वी पर जितने भी जीवजन्तु अर्थात् प्राणी हैं आसनों की संख्या भी उतनी ही मानी गई है । प्राचीन काल में भगवान शिव ने उनमें से चौरासी लाख ( 8400000 ) आसनों को माना है । उसके बाद अर्थात् मध्यकाल में चौरासी सौ ( 8400 ) आसनों को प्रमुख माना गया था । जिनमें से मृत्युलोक अर्थात् वर्तमान समय में मात्र बत्तीस ( 32 ) आसनों को ही मनुष्य के लिए शुभ अर्थात् कल्याणकारी माना गया है ।

 

 

विशेष :- आसनों की संख्या के विषय में सभी योग आचार्यों के अलग अलग मत हैं । जिनमें महर्षि घेरण्ड ने घेरण्ड संहिता में बत्तीस ( 32 ) आसनों का, स्वामी स्वात्माराम ने हठ प्रदीपिका में पन्द्रह ( 15 ) आसनों का, योगी श्रीनिवासन ने हठ रत्नावली में छत्तीस ( 36 ) आसनों का, योगी गुरु गोरक्षनाथ ने सिद्ध सिद्धान्त पद्धति में मात्र तीन ( 3 ) आसनों का, शिव संहिता में मात्र चार ( 4 ) आसनों का, योगदर्शन के व्यास भाष्य में महर्षि व्यास ने तेरह ( 13 ) आसनों का वर्णन किया है । ऊपर वर्णित आसनों की संख्या को सभी विद्यार्थी अच्छे से याद कर लें । इनसे सम्बंधित कोई भी प्रश्न परीक्षा में पूछा जा सकता है । इसके अतिरिक्त ऊपर वर्णित श्लोकों से सम्बंधित भी कुछ प्रश्न बनते हैं । जिनका वर्णन करना आवश्यक है । जैसे- आसनों की संख्या किनके बराबर मानी गई है ? जिसका उत्तर है सभी जीवजन्तुओं के बराबर । प्राचीन काल में भगवान शिव ने आसनों के कितने प्रकार ( संख्या ) माने हैं ? जिसका उत्तर है चौरासी लाख । मध्यकाल में आसनों के कितने प्रकारों को मान्यता मिली है ? जिसका उत्तर है चौरासी सौ । मृत्युलोक अर्थात् वर्तमान समय में, महर्षि घेरण्ड या घेरण्ड संहिता में आसनों की कितनी संख्या मानी गई है ? जिसका उत्तर है बत्तीस ।

 

बत्तीस आसनों के नाम

 

सिद्धं पद्मं तथा भद्रं मुक्तं वज्रञ्च स्वस्तिकम् ।

सिंहञ्च गोमुखं वीरं धनुरासनमेव च ।। 3 ।।

 मृतं गुप्तं तथा मत्स्यं मत्स्येन्द्रासनमेव च ।

गोरक्षं पश्चिमोत्तानं उत्कटं संकटं तथा ।। 4 ।।

मयूरं कुक्कुटं कुर्मं तथाचोत्तानकूर्मकम् ।

उत्तान मण्डूकं वृक्षं मण्डूकं गरुडं वृषम् ।। 5 ।।

शलभं मकरं चोष्ट्रं भुजङ्गञ्चयोगासनम् । द्वात्रिंशदासनानि तु मर्त्यलोके हि सिद्धिदम् ।। 6 ।।

 

भावार्थ :-  इस मृत्युलोक अर्थात् वर्तमान समय में निम्न बत्तीस आसन ही मनुष्य को सिद्धि प्राप्त करवाने वाले हैं । जिनका वर्णन इस प्रकार है :- 1. सिद्धासन, 2. पद्मासन, 3. भद्रासन, 4. मुक्तासन, 5. वज्रासन, 6. स्वस्तिकासन, 7. सिंहासन, 8. गोमुखासन, 9. वीरासन, 10. धनुरासन, 11. मृतासन / शवासन, 12. गुप्तासन, 13. मत्स्यासन, 14. मत्स्येन्द्रासन, 15. गोरक्षासन, 16. पश्चिमोत्तानासन, 17. उत्कट आसन, 18. संकट आसन, 19. मयूरासन, 20. कुक्कुटासन, 21. कूर्मासन, 22. उत्तानकूर्मासन, 23. मण्डूकासन, 24. उत्तान मण्डूकासन, 25. वृक्षासन, 26. गरुड़ासन, 27. वृषासन, 28. शलभासन, 29. मकरासन, 30. उष्ट्रासन,

31.    भुजंगासन व 32. योगासन ।

32.सिद्धासन वर्णन

33.     

34.                योनिस्थानकमङ्घ्रिमूलघटितं संपीड्य गुल्फेतरम् मेढ्रे सम्प्रणिधाय तं तु चिबुकं कृत्वा हृदि स्थापितम् ।

35.                स्थाणु: संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन् भ्रुवोरन्तरमेवंमोक्षविधायतेफलकरं सिद्धासनं प्रोच्यते ।। 7 ।।

36.                 

37.    भावार्थ :- एक पैर की एड़ी ( विशेषतः बायें पैर की ) से योनिस्थान ( अंडकोशों के नीचे ) को दबायें । दूसरे पैर की एड़ी को लिङ्गमूल ( स्वाधिष्ठान चक्र के नीचे का वह स्थान जहाँ से लिंग शुरू होता है ) पर रखें । इसके बाद अपनी ठुड्डी को हृदय प्रदेश के ऊपर स्थापित ( टिकाएं ) करके पूर्ण रूप से स्थिर होकर अर्थात् बिना किसी प्रकार की हलचल किये दृष्टि को दोनों भौहों के मध्य ( आज्ञा चक्र ) में लगाकर बैठना सिद्धासन कहलाता है । इस प्रकार सिद्धासन का अभ्यास करने से साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

38.     

39.     

40.    पद्मासन की विधि

41.     

42.                वामोरूपरि दक्षिणं च चरणं संस्थाप्य वामं तथा

43.                दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम् ।

44.                अङ्गुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकयेद्

45.                एतद्व्याधिविनाशकारणपरं पद्मासनं प्रोच्यते ।। 8 ।।

46.                 

47.    भावार्थ :- बायीं जंघा पर दायें पैर को व दायीं जंघा पर बायें पैर को रखें । अब दोनों हाथों को कमर के पीछे से ले जाते हुए दायें हाथ से दायें व बायें हाथ से बायें पैर के अँगूठों को मजबूती से पकड़ें । इसके बाद अपनी ठुड्डी को छाती पर लगाकर नासिका के अग्र भाग ( अगले हिस्से ) को देखना पद्मासन कहलाता है । पद्मासन का अभ्यास करने से साधक के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं ।

48.     

49.     

50.    विशेष :- सामान्यतः ऊपर वर्णित पद्मासन की विधि को हम बद्ध पद्मासन के नाम से जानते हैं । लेकिन यहाँ पर महर्षि घेरण्ड ने इसे पद्मासन कहकर संबोधित किया है ।

51.     

52.     

53.    भद्रासन विधि व लाभ

54.     

55.                गुल्फौ च वृषणस्याधो व्युत्क्रमेण समाहित: ।

56.                पादाङ्गुष्ठौ कराभ्याञ्च धृत्वा च पृष्ठदेशत: ।। 9 ।।

57.                जालन्धरं समासाद्य नासाग्रमवलोकयेत् ।

58.                भद्रासनं भवेदेतत्सर्वव्याधिविनाशकम् ।। 10 ।।

59.                 

60.    भावार्थ :- अपने दोनों पैरों की एड़ियों को उल्टा करके ( पँजें पीछे व एड़ियां आगे की ओर ) अंडकोशों के नीचे रखें । इसके बाद दोनों हाथों को पीछे की ओर ले जाकर पैरों के दोनों अँगूठों को मजबूती से पकड़ें फिर जालन्धर बन्ध लगाकर ( ठुड्डी को छाती में लगाना ) नासिका के अग्रभाग ( अगले हिस्से ) को देखना भद्रासन कहलाता है । भद्रासन का अभ्यास करने से साधक के सभी प्रकार के रोग समाप्त हो जाते हैं ।

61.मुक्तासन वर्णन

62.     

63.                पायुमूले वामगुल्फं दक्षगुल्फं तथोपरि ।

64.                समकायशिरोग्रीवं मुक्तासनन्तु सिद्धि दम् ।। 11 ।।

65.                 

66.    भावार्थ :- पैर की बायीं ऐड़ी को गुदाद्वार में लगाकर उसके ऊपर दायें पैर की एड़ी को रखें । सिर व गर्दन को बिना हिलायें बिलकुल सीधी करके बैठना मुक्तासन कहलाता है । यह मुक्तासन साधक को अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करता है ।

67.     

68.     

69.    वज्रासन वर्णन

70.     

71.                जंघाभ्यां वज्रवत्कृत्वा गुदपार्श्वे पदावुभौ ।

72.                वज्रासनं भवेदेतद्योगिनां सिद्धिदायकम् ।। 12 ।।

73.                 

74.    भावार्थ :- दोनों जँघाओं को वज्र के समान मजबूत व स्थिर करके दोनों पैरों के पँजों को गुदा प्रदेश के दोनों ओर समान रूप से रखते हुए बैठना वज्रासन कहलाता है । यह वज्रासन योगियों को सिद्धि प्रदान करने वाला होता है ।

75.     

76.     

77.स्वस्तिकासन वर्णन

78.     

79.                जानूर्वोरन्तरे कृत्वा योगी पादतले उभे ।

80.                ऋजुकाय: समासीन: स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ।। 13 ।।

81.                 

82.    भावार्थ :- दोनों पैरों के तलवों को पिंडलियों व जाँघों के बीच में रखकर ( बायें पैर के तलवे को दायें पैर की पिंडली व जँघा के बीच व दायें पैर के तलवे को बायें पैर की पिंडली व जँघा के बीच में रखें ) तनाव रहित अर्थात् सुखपूर्वक बैठना स्वस्तिकासन कहलाता है ।

83.     

84.     

85.    सिंहासन वर्णन

86.     

87.     

88.                गुल्फौ च वृषणस्याधो व्युत्क्रमेणोर्ध्वतां गतौ ।

89.                चितिमूलौ भूमिसंस्थौ कृत्वा च जानु नोपरि ।। 14 ।।

90.                व्यक्तवक्त्रो जलंध्रञ्च नासाग्रमवलोकयेत् ।

91.                सिंहासनं भवेदेतत् सर्वव्याधिविनाशकम् ।। 15 ।।

92.                 

93.    भावार्थ :- दोनों पैरों के पँजों को अंडकोशों के नीचे जमीन में रखते हुए ( पँजे नीचे व ऐड़ी ऊपर की ओर ) दोनों घुटनों को जमीन में टिकाएं । इसके बाद के ठीक ऊपर मुहँ को पूरा खोलकर जालन्धर बन्ध लगाते हुए नासिका के अग्रभाग को देखना सिंहासन कहलाता है । सिंहासन का अभ्यास करने से साधक के सभी प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं ।

94.     

95.     

96.    गोमुखासन वर्णन

97.     

98.                पादौ च भूमौ संस्थाप्य पृष्ठपार्श्वे निवेशयेत् ।

99.                स्थिरकायं समासाद्य गोमुखं गोमुखाकृति: ।। 16 ।।

100.           

101. भावार्थ :- साधक सर्वप्रथम अपने दोनों पैरों ( पँजों ) को भूमि पर रखकर अपनी पीठ ( नितम्बों ) के दोनों ओर स्थापित करें ( इसमें दोनों घुटने एक दूसरे को क्रॉस करते हुए एक दूसरे के ऊपर नीचे रहेंगे ) और शरीर को बिना हिलायें- डुलायें उसी स्थिति में रखें । इस प्रकार शरीर की आकृति गाय के मुख के समान बन जाती है । इसी को गोमुखासन कहा गया है ।

102.  

103.  

104. विशेष :- गोमुखासन को परीक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण आसन माना जाता है । इससे सम्बंधित निम्न प्रश्न पूछे जाते हैं :- गोमुखासन में शरीर की आकृति गाय के किस अंग के समान होती है ? जिसका उत्तर है गाय के मुहँ अर्थात् मुख के समान । इसके अतिरिक्त गोमुखासन स्वयं में ही पूरक आसन होता है । इसको एक बार बायें पैर को ऊपर करके और फिर दायें पैर को ऊपर रखकर करने से ही इसको पूरक आसन माना जाता है । अतः इसका कोई विपरीत या पूरक आसन नहीं होता है ।

105.                वीरासन वर्णन

106.  

107.          एकपादमथैकस्मिन्विन्यसेदूरूसंस्थितम् ।

108.          इतरस्मिंस्तथा पश्चाद्वीरासनमितीरितम् ।। 17 ।।

109.  

110. भावार्थ :-  एक पैर के पँजे को उल्टा करके दूसरे पैर की जँघा पर रखें ( जिस पैर के पँजे को जँघा पर रखा है उसके घुटने को जमीन पर टिकाकर रखना चाहिए ) । फिर उस दूसरे पैर को पीछे की ओर रखें ( जिस पैर पर पँजा रखा है ) । यह विधि वीरासन कहलाती है ।

111.  

112. धनुरासन वर्णन

113.  

114.          प्रसार्य पादौ भुवि दण्डरूपौ करौ च पृष्ठे धृतपादयुग्मम् ।

115.          कृत्वा धनुस्तुल्यपरिवर्त्तिताङ्गं निधाय योगी धनुरासनं तत् ।। 18 ।।

116.           

117. भावार्थ :-  जमीन पर पेट के बल लेटकर दोनों पैरों को पीछे की ओर डण्डे की तरह फैला कर रखें । अब दोनों हाथों से अपने पैरों को पकड़कर ( बायें हाथ से बायां पैर व दायें हाथ से दायां पैर ) शरीर को धनुष की तरह खींचते हुए अंगों को बदलना चाहिए ।  अंगों को बदलने का अर्थ है अपने दोनों हाथों को कन्धों के ऊपर से घुमाना । इससे दोनों हाथों की कोहनियाँ आगे की ओर हो जाती हैं । यह विधि धनुरासन कहलाती है ।

118.  

119. मृतासन / शवासन वर्णन

120.  

121.          उत्तान शववद् भूमौ शयानन्तु शवासनम् ।

122.          शवासनं श्रमहरं चित्तविश्रान्तिकारणम् ।। 19 ।।

123.           

124. भावार्थ :- पेट व छाती को ऊपर की ओर करके भूमि पर सीधा लेटना शवासन कहलाता है । शवासन का अभ्यास करने से साधक के शरीर की थकान दूर होती है और चित्त को आराम मिलता है ।

125.  

126. विशेष :- मृतासन का दूसरा नाम शवासन है । परीक्षा में यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि मृतासन का अन्य नाम क्या है ? इसके अलावा यह भी पूछा जा सकता है कि कौन सा आसन व्यक्ति की थकान मिटाने है और  चित्त को विश्राम दिलाता है ? जिसका उत्तर है शवासन अथवा मृतासन ।

127.  

128. गुप्तासन वर्णन 

129.  

130.          जानूर्वोरन्तरे पादौ कृत्वा पादौ च गोपयेत् ।

131.          पादोपरि च संस्थाप्य गुदं गुप्तासनं विदुः ।। 20 ।।

132.           

133. भावार्थ :-  सुखासन में बैठकर दोनों पैरों के पँजों को जाँघों के नीचे छिपाते हुए उनको पीछे की ओर रखें और उनके ऊपर गुदा प्रदेश को टिकाकर रखना गुप्तासन कहलाता है ।

134.  

135.  

136. मत्स्यासन वर्णन

137.  

138.          मुक्तपद्मासनं कृत्वा उत्तानशयनञ्चरेत् ।

139.          कूर्पराभ्यां शिरो वेष्टय मत्स्यासनन्तु रोगहा ।। 21 ।।

140.           

141. भावार्थ :-  मुक्त पद्मासन करते हुए अर्थात् दोनों हाथों से पैरों के पँजों को बिना पकड़े केवल पद्मासन लगाकर सिर को अपनी दोनों कोहनियों के बीच में रखते हुए सीधा लेटना ( कमर के बल लेटना ) मत्स्यासन कहलाता है । मत्स्यासन साधक के सभी रोगों को दूर कर देता है ।

142.  

143.  

144. पश्चिमोत्तान आसन वर्णन

145.  

146.          प्रसार्य पादौ भुवि दण्डरूपौ संन्यस्तभालं चितियुग्ममध्ये ।

147.          यत्नेन पादौ च धृतौ कराभ्यां योगिन्द्रपीठं पश्चिमोत्तानमाहु: ।। 22 ।।

148.           

149. भावार्थ :-  अपने दोनों पैरों को भूमि पर सामने की ओर फैलाते हुए दण्डासन की स्थिति में बैठकर अपने माथे को दोनों घुटनों के बीच में रखते हुए दोनों पैरों के पँजों को मजबूती के साथ पकड़ें । योगियों ने इसे प्रमुख आसन माना है । जिसे पश्चिमोत्तान आसन कहते हैं ।

150.  

151.  

152. विशेष :-  इस आसन में पीठ का अग्रगामी फैलाव होने से इसे पश्चिमोत्तान आसन कहा जाता है । इस प्रकार का प्रश्न भी कई बार परीक्षा में पूछ लिया जाता है ।

153.                मत्स्येंद्रासन वर्णन

154.  

155.          उदरं पश्चिमाभासं कृत्वा तिष्ठति यत्नतः ।

156.          नम्राङ्गं  वामपादं हि दक्षजानूपरि न्यसेत् ।। 23 ।।

157.          तत्र याम्यं कूपरञ्च याम्यं करे च वक्त्रकम् ।

158.          भ्रुवोर्मध्ये गतां दृष्टिं पीठं मात्स्येन्द्रमुच्यते ।। 24 ।।

159.  

160. भावार्थ :-  अपने पेट को पीछे पीठ ( कमर ) की ओर ले जाने का प्रयास करें और बायें पैर को आगे से घुमाते हुए दायें पैर के घुटने के पास में रखें । इसके बाद मुहँ को भी घुमाते हुए बायें हाथ ( कन्धे ) के ऊपर रखें और दृष्टि को दोनों भौहों के बीच में ( आज्ञा चक्र ) में स्थित करदें । ऐसा करना मत्स्येन्द्रासन कहलाता है ।

161.  

162.  

163. विशेष :- मत्स्येन्द्रासन का नाम ऋषि मत्स्येन्द्रनाथ के नाम पर रखा गया है । कई बार परीक्षा में पूछ लिया जाता है कि मत्स्येन्द्रासन का सम्बन्ध किससे है या मत्स्येन्द्रासन को मत्स्येन्द्रासन ही क्यों कहा जाता है ? जिसका उत्तर है ऋषि मत्स्येंद्रनाथ ।

164.  

165.  

166.                गोरक्षासन वर्णन

167.  

168.          जानूर्वोन्तरे पादौ उत्तानौव्यक्तसंस्थितौ ।

169.          गुल्फौ चाच्छाद्य हस्ता भ्यामुत्तानाभ्यां प्रयत्नतः ।। 25 ।।

170.          कण्ठ संकोचनं कृत्वा नासाग्रमवलोकयेत् ।

171.          गोरक्षासनमित्याह योगिनां सिद्धिकारणम् ।। 26 ।।

172.  

173. भावार्थ :-  अपने पैरों के दोनों तलवों को घुटने व जँघाओं के बीच में छिपाकर रखें और दोनों हाथों की हथेलियों से दोनों पैरों की एड़ियों के ऊपर स्थापित करदें । अब अपने कण्ठ प्रदेश को सिकोड़ते हुए नासिका के अग्रभाग ( नाक के अगले हिस्से को ) देखना चाहिए । यह योगियों को सिद्धि प्राप्त करवाने वाला गोरक्षासन कहलाता है ।

174.  

175.  

176.                उत्कटासन वर्णन

177.  

178.          अङ्गुष्ठाभ्यामवष्टभ्य धरां गुल्फौ च खे गतौ ।

179.          तत्रोपरि गुदं न्यस्य विज्ञेयमुत्कटासनम् ।। 27 ।।

180.           

181. भावार्थ :-  दोनों पैरों के अँगूठों के ऊपर पूरे शरीर का भार रखते हुए दोनों एड़ियों को ऊपर उठाकर उनके ऊपर गुदा प्रदेश ( दोनों नितम्बों ) को रखें । ऐसा करना उत्कटासन कहलाता है ।

182.  

183.  

184. विशेष :- श्लोक में गुदा प्रदेश को दोनों एड़ियों पर रखने की बात कही गई है जो कि सम्भव प्रतीत नहीं होती । यहाँ पर ऋषि घेरण्ड का मत दोनों नितम्बों से रहा होगा । ऐसा मेरा मानना है । क्योंकि दोनों एड़ियों पर एक साथ गुदा प्रदेश को रखना तर्कपूर्ण नहीं है ।

185.  

186.                 संकटासन वर्णन

187.  

188.          वामपादं चित्तेर्मूलं संन्यस्य धरणीतले ।

189.          पाद दण्डेन याम्येन वेष्टयेद्वामपादकम् ।

190.          जानुयुग्मे कर युग्ममेतत्संकटासनम् ।। 28 ।।

191.  

192. भावार्थ :- बायें पैर के घुटने के अग्रभाग ( अगले हिस्से को ) को जमीन पर टिकाते हुए दायें पैर को बायें पैर पर लपेटकर दोनों हाथों की हथेलियों को दोनों पैरों के घुटनों पर रखें । इस विधि को संकटासन कहते हैं ।

193.                मयूरासन वर्णन

194.  

195.          धरामवष्टभ्य करयोस्तलाभ्यां तत्कूर्परे स्थापितनाभिपार्श्वम् ।

196.          उच्चासनो दण्डवदुत्थित: खे मायूरमेतत्प्रवदन्ति पीठम् ।। 29 ।।

197.           

198. भावार्थ :-  दोनों हाथों की हथेलियों को जमीन पर मजबूती के साथ रखते हुए दोनों कोहनियों को नाभि प्रदेश के दोनों तरफ ( दायीं व बायीं ओर ) रखकर पूरे शरीर को दोनों कोहनियों पर डण्डे के समान सीधा उठाकर रखना मयूरासन कहलाता है ।

199.  

200.  

201. विशेष :- मयूरासन का नामकरण मोर नामक पक्षी पर रखा गया है । जिस प्रकार मोर अपने पूरे शरीर को अपनी कोहनियों पर उठाए रखता है । उसी प्रकार शरीर की स्थिति करने को मयूरासन कहते हैं । मयूरासन से जठराग्नि इतनी तीव्र हो जाती है कि विषाक्त भोजन खाने पर भी वह उसे शीघ्र पचा देता है । इसलिए मयूरासन करने वाले साधक को कभी भी पाचन तंत्र से जुड़ी कोई समस्या नहीं होती । इस आसन को महिलाओं के लिए वर्जित माना जाता है । इसका कारण यह है कि जहाँ पर दोनों कोहनियों को रखा जाता है । वहाँ पर महिलाओं का गर्भाशय स्थित होता है । इसके करने से कई बार महिलाओं को गर्भाशय से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है । इसलिए इसे महिलाओं के लिए प्रायः वर्जित माना जाता है ।

202. ऊपर वर्णित सभी बातें परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी हैं ।

203.  

204.  

205.                कुक्कुटासन वर्णन

206.  

207.          पद्मासनं समासाद्य जानूर्वोन्तरे करौ ।

208.          कर्पूराभ्यां समासीन उच्चस्थ: कुक्कुटासनम् ।। 30 ।।

209.           

210. भावार्थ :-  पद्मासन लगाकर अपने दोनों हाथों को पिंडलियों व जाँघों के बीच में से निकालते हुए भूमि पर दोनों हथेलियों को अच्छे से स्थापित करदें । इससे शरीर जमीन से ऊपर उठ जाएगा । इस स्थिति में साधक को ऐसा प्रतीत है कि वह किसी मंच अथवा लकड़ी के स्टूल पर बैठा है । इसे कुक्कुटासन कहते हैं ।

211.  

212.  

213.                कूर्मासन वर्णन

214.  

215.          गुल्फौ च वृषणस्याधो व्युत्क्रमेण समाहितौ ।

216.          ऋजुकायशिरोग्रीवं कूर्मासनमितीरितम् ।। 31 ।।

217.           

218. भावार्थ :-  सुखासन में बैठकर अपने दोनों पैरों को उल्टा करके एड़ियों के ऊपर अंडकोशों को रखें । फिर अपने सिर, गर्दन व शरीर को सीधा रखना ( एक सीध में ) कूर्मासन कहलाता है ।

219.  

220.  

221. विशेष :- कूर्मासन के विषय में पूछा जा सकता है कि कूर्मासन में कूर्म का क्या अर्थ है ? जिसका उत्तर है कछुआ । कछुए को संस्कृत भाषा में कूर्म बोला जाता है । इस आसन में शरीर की स्थिति कछुए के समान हो जाती है । जिसके कारण इसे कूर्मासन कहा जाता है ।

222.  

223.  

224.                उत्तानकूर्मासन वर्णन

225.  

226.          कुक्कुटासनबन्धस्थं कराभ्यां धृतकन्धरम् ।

227.          पीठं कूर्मवदुत्तानमेतदुत्तानकूर्मकम् ।। 32 ।।

228.  

229. भावार्थ :-  पहले कुक्कुटासन की स्थिति में बैठें ( कुक्कुटासन की स्थिति के लिए श्लोक संख्या 30 को देखें ) । अब दोनों हाथों से अपने कन्धों अथवा गर्दन को पकड़कर कछुए के समान सीधे लेट जाना उत्तान कूर्मासन कहलाता है ।

230.  

231.  

232.                उत्तानमण्डूक आसन

233.  

234.          मण्डूकासनमध्यस्थं कूर्पराभ्यां धृतं शिर: ।

235.          एतत् भेकवदुत्तानमेतदुत्तान मण्डुकम् ।। 33 ।।

236.  

237. भावार्थ :-  सर्वप्रथम मण्डूकासन की स्थिति में बैठकर ( मण्डूकासन की स्थिति को जानने के लिए श्लोक संख्या 35 देखें ) दोनों हाथों की हथेलियों से अपने सिर को पकड़ते हुए मेंढक की तरह सीधा लेट जाना उत्तान मण्डूकासन कहलाता है ।

238.  

239.  

240.                वृक्षासन वर्णन

241.  

242.          वामोरुमूलदेशे च याम्यं पादं निधान तु ।

243.          तिष्ठेत्तु वृक्षवद् भूमौ वृक्षासनमिदं विदुः ।। 34 ।।

244.  

245. भावार्थ :-  बायें पैर की जँघा पर दायें पैर ( तलवे को ) को स्थापित ( रखकर ) करके भूमि पर पेड़ की भाँति सीधे खड़े रहना वृक्षासन कहलाता है ।

246.  

247. विशेष :- वृक्षासन का सम्बंध पेड़ से होता है । जिस प्रकार पेड़ एक ही तने के ऊपर सीधा खड़ा रहता है । ठीक उसी प्रकार शरीर को एक पैर पर स्थिर कर देना वृक्षासन कहलाता है ।

248.  

249.  

250.                मण्डूकासन वर्णन

251.  

252.          पृष्ठदेशे पादतलौ अङ्गुष्ठे द्वे च संस्पृशेत् ।

253.          जानुयुग्मं पुरस्कृत्य साधयेन् मण्डुकासनम् ।। 35 ।।

254.  

255. भावार्थ :-  दोनों घुटनों को जमीन पर रखते हुए दोनों पैरों के तलवों को पीछे की ओर करें और अँगूठों को जमीन पर टिकाकर रखें । शरीर की इस स्थिति को मण्डूकासन कहते हैं ।

256.  

257. विशेष :- मण्डूकासन में मण्डूक शब्द का अर्थ मेंढक होता है । जिसको कई बार परीक्षा में भी पूछ लिया जाता है ।

258.                गरुड़ासन वर्णन

259.  

260.          जंघोंरुभ्यां धरां पीड्य स्थिरकायो द्विजानुनी ।

261.          जानूपरि करयुग्मं गरुड़ासनमुच्यते ।। 36 ।।

262.  

263. भावार्थ :-  दोनों जाँघों व घुटनों से भूमि को दबाते हुए दोनों हाथों घुटनों के ऊपर हाथों को टिकाकर रखना गरुड़ासन कहलाता है ।

264.  

265.  

266. विशेष :- गरुड़ासन में गरुड़ शब्द का अर्थ गरुड़ नामक पक्षी होता है । जिसे हम इंग्लिश में ईगल व हिन्दी में बाज कहते हैं । लेकिन यहाँ पर गरुड़ासन की जिस विधि का वर्णन किया गया है और जो वर्तमान समय में गरुड़ासन की प्रचलित विधि है । इन दोनों में बहुत अन्तर है ।

267.  

268.  

269.                वृषासन वर्णन

270.  

271.          याम्यगुल्फे पायुमूलं वामभागे पदेतरम् ।

272.          विपरीतं स्पृशेद् भूमिं वृषासनमिदं भवेत् ।। 37 ।।

273.  

274. भावार्थ :-  दायें पैर की एड़ी को गुदाद्वार पर रखकर बायें पैर को मोड़ते हुए भूमि पर उसका स्पर्श करें । यह वृषासन कहलाता है ।

275.  

276.  

277.                शलभासन वर्णन

278.  

279.          अधास्य शेते करयुग्मं वक्षे भूमिमवष्टभ्य करयोस्तलाभ्याम् ।

280.          पादौ च शून्ये च वितस्ति चोर्ध्वंवदन्ति पीठं शलभं मुनीन्द्रा: ।। 38 ।।

281.           

282. भावार्थ :-  पहले भूमि पर पेट के बल लेटकर दोनों हाथों की हथेलियों को छाती के नीचे जमीन की ओर करें । अब मुख को नीचे की तरफ रखते हुए दोनों पैरों को ऊपर आकाश की ओर लगभग एक बिलात ( 9 से 12 इंच तक ) उठाएं । श्रेष्ठ योगी मुनियों ने इसे शलभासन का नाम दिया है ।

283.  

284.  

285. विशेष :-  शलभासन में शलभ शब्द का अर्थ टिड्डी नामक कीट होता है । जो पीछे से थोड़ा उठा रहता है । इसी कारण इस आसन का नाम शलभासन पड़ा है । यह परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी है ।

286.  

287.  

288.                मकरासन वर्णन

289.  

290.          अधास्य शेते हृदयं निधाय भूमौ च पादौ च प्रसार्यमाणौ ।

291.          शिरे च धृत्वा करदण्डयुग्मे देहाग्निकारं मकरासनं तत् ।। 39 ।।

292.  

293. भावार्थ :-  हृदय प्रदेश को नीचे रखते हुए पेट के बल लेटकर दोनों पैरों को पीछे की ओर डण्डे की तरह सीधा फैलाएं । इसके बाद दोनों हाथों की हथेलियों पर अपने माथे को रखें । इस स्थिति को मकरासन कहा गया है । इस मकरासन के अभ्यास से साधक की जठराग्नि प्रदीप्त ( तीव्र ) होती है ।

294.  

295.  

296. विशेष :- मकर का अर्थ होता है मगरमच्छ । जब मगरमच्छ आराम करता है तो वह इसी अवस्था में रहता है साथ ही मगरमच्छ की पाचन शक्ति बहुत अच्छी होती है । इसलिए मगरमच्छ के जैसी अवस्था होने व उस जैसी पाचन शक्ति होने के कारण इसे मकरासन का नाम दिया गया है ।

297.  

298.  

299.                उष्ट्रासन वर्णन

300.  

301.          अधास्य शेते पदयुग्मव्यस्तं पृष्ठे निधायापि धृतं कराभ्याम् ।

302.          आकुञ्चयेत्सम्यगुदरास्यगाढमौष्ट्रञ्च पीठं योगिनो वदन्ति ।। 40 ।।

303.  

304. भावार्थ :- अपने मुख को नीचे ( पीछे की ओर ) करते हुए दोनों पैरों को पीछे की ओर करते हुए अलग- अलग खोलें ।  दोनों हाथों को घुमाते हुए पैरों को पकड़ें । इस अवस्था में पेट को अधिक से अधिक अन्दर की तरफ सिकोड़ें । इस स्थिति को योगीजनों ने उष्ट्रासन कहा है ।

305.  

306.  

307. विशेष :-  उष्ट्रासन में उष्ट्र शब्द का अर्थ ऊँट होता है । ऊँट के समान आकृति होने के कारण इसे उष्ट्रासन कहा जाता है ।

308.  

309.  

310.                भुजंगासन वर्णन

311.  

312.          अङ्गुष्ठनाभिपर्यन्तमधोभूमौ विनिन्यसेत् ।

313.          करतलाभ्यां धरां धृत्वा ऊर्ध्वंशीर्ष: फणीव हि ।। 41 ।।

314.          देहाग्निर्वर्द्धते  नित्यं सर्वरोगविनाशनम् ।

315.          जागर्ति भुजनी देवी भुजंगासनसाधनात् ।। 42 ।।

316.  

317. भावार्थ :-  दोनों हाथों की हथेलियों को जमीन में रखकर नाभि तक के शरीर को सिर समेत साँप के समान ( जिस प्रकार साँप अपने फण को उठाता है ) ऊपर की ओर उठाएं । दोनों हाथों के अँगूठे नाभि की ओर अथवा उसके समीप होने चाहिए । इस स्थिति को भुजंगासन कहते हैं । भुजंगासन का अभ्यास करने से साधक की जठराग्नि प्रतिदिन तीव्र होती जाती है । इससे सभी रोग नष्ट हो जाते हैं । इसके अलावा भुजंगासन की साधना करने से भुजंगी देवी ( कुण्डलिनी शक्ति ) जागृत होती है ।

318.  

319.  

320. विशेष :-  भुजंग शब्द का अर्थ साँप होता है । साँप को ही संस्कृत भाषा में भुजंग बोला जाता है । इसमें शरीर की स्थिति साँप की भाँति होने से इसे भुजंगासन कहा जाता है । इसके अभ्यास से साधक की कुण्डलिनी शक्ति भी जागृत होती है । यह परीक्षा की दृष्टि से काफी उपयोगी जानकारी है ।

321.  

322.  

323.                योगासन वर्णन

324.  

325.          उत्तानौ चरणौ कृत्वा संस्थाप्य जानुनोपरि ।

326.          आसनोपरि संस्थाप्य उत्तानं करयुग्मकम् ।। 43 ।।

327.          पूरकैर्वायुमाकृष्य नासाग्रमवलोकयेत् ।

328.          योगासनं भवेदेतद्योगिनां योगसाधने ।। 44 ।।

329.           

330. भावार्थ :-  दोनों पैरों के तलवों को ऊपर की ओर करते हुए अपनी जाँघों पर रखें । अब दोनों हाथों की हथेलियों को ऊपर की ओर ( सीधी ) करते हुए पैरों पर रखें । इसके बाद श्वास को शरीर के अन्दर भरकर नासिका के अग्रभाग ( अगले हिस्से ) को देखना चाहिए । योगियों ने इसे योग साधना को साधने ( सफलता दिलाने वाला ) वाला कहते हुए योगासन का नाम दिया है ।

331.  

332.                    ।। इति द्वितीयोपदेश: समाप्त: ।।

333.  

334.                तृतीय अध्याय ( मुद्रा प्रकरण )

335.  

336. घेरण्ड संहिता के तीसरे अध्याय का विषय मुद्रा है । जिसमें ऋषि घेरण्ड ने सिद्धियों की प्राप्ति के लिए पच्चीस मुद्राओं का वर्णन किया है । मुद्रा के फल को बताते हुए कहा है कि मुद्राओं का अभ्यास करने से साधक को स्थिरता प्राप्त होती है ।

337.  

338.                मुद्रा वर्णन ( 25 )

339.  

340.          महामुद्रा नभोमुद्रा उड्डीयानं जलन्धरम् ।

341.          मूलबन्धं महाबन्धं महावेधश्च खेचरी ।। 1 ।।

342.          विपरीतकरी योनिर्वज्रोली शक्तिचालिनी ।

343.          तडागी माण्डुकी मुद्रा शाम्भवी पचंधारणा ।। 2 ।।

344.          अश्विनी पाशिनी काकी मातङ्गी च भुजङ्गिनी ।

345.          पञ्चविंशति मुद्राणि सिद्धदानीह योगिनाम् ।। 3 ।।

346.  

347. भावार्थ :- महामुद्रा, नभोमुद्र, उड्डीयान, जालन्धर, मूलबन्ध, महाबन्ध, महावेध, खेचरी, विपरीतकरणी, योनि, वज्रोली, शक्तिचालिनी, तडांगी, मांडवी, शाम्भवी, पञ्चधारणा ( पार्थिवी धारणा, आम्भसी धारणा, आग्नेयी धारणा, वायवीय धारणा, आकाशी धारणा ), अश्वनी, पाशिनी, काकी, मातङ्गी और भुजंगिनी यह पच्चीस ( 25 ) मुद्राएँ योगियों को सिद्धियाँ प्रदान करवाने वाली हैं ।

348.  

349. विशेष :-  इस तीसरे अध्याय में ऋषि घेरण्ड ने पच्चीस मुद्राओं का वर्णन किया है । जो साधक को अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं । इन मुद्राओं में पाँच प्रकार की धारणाओं का भी वर्णन किया गया है । जो कि मुद्राओं के ही प्रकार हैं । परीक्षा में इससे सम्बंधित भी पूछा जाता है कि घेरण्ड संहिता में कितनी धारणाओं का वर्णन किया गया है ? जिसका उत्तर है पाँच । इसके अलावा यह भी पूछा जा सकता है कि धारणाओं का वर्णन सप्तांग योग अथवा घेरण्ड संहिता के किस अंग में किया गया है ? जिसका उत्तर है योग के तीसरे अंग / तीसरे अध्याय में वर्णित मुद्राओं में । इसके साथ ही मुद्राओं में तीन प्रकार के बन्धों का भी वर्णन किया गया है :- उड्डीयान बन्ध, जालन्धर बन्ध व मूलबन्ध । इन तीनों बन्धों को एक साथ लगाने को महाबन्ध का नाम दिया गया है ।

350.  

351.                मुद्राओं का फल

352.  

353.          मुद्राणां पटलं देवि कथितं तव सन्निधौ ।

354.          येन विज्ञातमात्रेण सर्वसिद्धि: प्रजायते ।। 4 ।।

355.  

356. भावार्थ :-  हे देवी! ( यहाँ पर देवी शब्द भगवान शिव की ओर से माता पार्वती के लिए कहा गया है ) मैंने तुम्हारे सम्मुख ( सामने ) जिन मुद्राओं के समूह का वर्णन किया है । इन सभी को केवल जानने मात्र से ही साधक को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ।

357.  

358.                मुद्राओं की गोपनीयता

359.  

360.          गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्य कस्यचित् ।

361.          प्रीतिदं योगिनाञ्चैव दुर्लभं मरुतामपि ।। 5 ।।

362.           

363. भावार्थ :- इन सभी मुद्राओं को पूरी तरह से गोपनीय रखना चाहिए । चाहे जिसको भी इनका ज्ञान नहीं देना चाहिए । यह मुद्राएँ देवताओं के लिए भी दुर्लभ ( प्राप्त करना कठिन हैं ) हैं । इनके अभ्यास से योगी साधक को आनन्द की प्राप्ति होती है ।

364.  

365.  

विशेष :- यहाँ पर चाहे जिसको भी इनका ज्ञान न देने से अभिप्राय यह है कि इनका ज्ञान हमेशा ही योग्य साधक को देना चाहिए । जो साधक इनका ज्ञान प्राप्त करने के लायक नहीं है । उसे कभी भी इनका ज्ञान नहीं देना चाहिए । इस प्रकार अयोग्य व्यक्ति को दिया गया ज्ञान कभी भी फलीभूत नहीं होता । अतः योग्य साधक को ही इनका उपदेश देना चाहिए ।महामुद्रा विधि वर्णन

 

पायुमूलं वाम गुल्फे सम्पीड्य दृढ़यत्नतः ।

याम्यपादं प्रसार्याथ करे धृतपदाङ्गुल: ।। 6 ।।

कण्ठ सङ्कोचनं कृत्वा भ्रुवोर्मध्ये निरीक्षीयत् ।

महामुद्राभिधा मुद्रा कथ्यते चैव सूरिभि: ।। 7 ।।

 

भावार्थ :-  बायें पैर की एड़ी को गुदाद्वार के मूल भाग ( अंडकोशों व गुदाद्वार के बीच में ) पर पूर्ण प्रयास के साथ लगाते हुए उसको एड़ी से दबाएं । अब दायें पैर को सामने की तरफ फैलाते हुए दोनों हाथों से दायें पैर के अँगूठे को पकड़ें । इसके बाद अपने कण्ठ अर्थात् गले को सिकोड़ते हुए अपनी दोनों भौहों ( दोनों आँखों के बीच में स्थित आज्ञा चक्र पर ) के बीच में देखें । विद्वानों ने इसे महामुद्रा का नाम दिया है ।

 

महामुद्रा का फल

 

क्षयकासं गुदावर्त्तं प्लीहाजीर्णज्वरं तथा । नाशयेत्सर्वरोगांश्च महामुद्रा च साधनात् ।। 8 ।।

 

भावार्थ :-  महामुद्रा के अभ्यास से साधक के क्षय व कासं रोग अर्थात् श्वास व बलगम सम्बन्धी रोग जैसे दमा व खाँसी आदि, गुदाद्वार के फोड़े या बवासीर व भगन्दर आदि रोग, प्लीहा ( मूत्र मार्ग से धातुओं का बहना ), पुराना बुखार आदि सभी रोग नष्ट हो जाते हैं ।

 

विशेष :-  परीक्षा की दृष्टि से यह पूछा जा सकता है कि महामुद्रा से कौन से रोग नष्ट होते हैं ? जिसका उत्तर ऊपर भावार्थ में दिया गया है ।

 

 

नभोमुद्र विधि व फल वर्णन

 

यत्र यत्र स्थितो योगी सर्वकार्येषु सर्वदा ।

ऊर्ध्वजिह्व: स्थिरो भूत्वा धारयेत् पवनं सदा ।

नभोमुद्रा भवेदेषा योगिनां रोगनाशिनी ।। 9 ।।

 

भावार्थ :-  योगी को सदा अपने सभी कार्यों को करते हुए एक जगह स्थित अथवा स्थिर होकर अपनी जीभ को ऊपर आकाश की ओर करते हुए उससे वायु को धारण अर्थात् वायु का पान करना चाहिए । इसे नभोमुद्रा कहा जाता है । इसका अभ्यास करने से योगी साधकों के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं ।

 

 

विशेष :-  नभोमुद्रा के सम्बंध में पूछा जा सकता है कि नभोमुद्रा में साधक द्वारा किसका सेवन या पान किया जाता है ? जिसका उत्तर है वायु ।

 

 

उड्डीयान मुद्रा विधि व फल वर्णन

 

उदरे पश्चिमं तानं नाभेरूर्ध्वं तु कारयेत् ।

उड्डानं कुरुते यस्माद विश्रान्तं महाखग: ।

उड्डीयानं त्वसौ बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी ।। 10 ।।

समग्राद् बन्धनादेतदुड्डीयानं विशिष्यते ।

उड्डीयाने समभ्यस्ते मुक्ति: स्वाभाविकी भवेत् ।। 11 ।।

 

भावार्थ :-  पेट में स्थित नाभि प्रदेश व उससे ऊपर के भाग को पीछे की ओर खींचना उड्डीयान बन्ध कहलाता है । उड्डीयान बन्ध से प्राण ऊर्जा निरन्तर ऊपर की ओर उर्ध्वगामी होती है । यह उड्डीयान बन्ध मृत्यु रूपी हाथी के सामने शेर के समान होता है । इस उड्डीयान बन्ध को सभी बन्धों में विशिष्ट ( प्रमुख ) माना गया है । उड्डीयान बन्ध का अभ्यास करने से साधक को बिना किसी विशेष प्रयास के स्वयं ही मुक्ति अथवा मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है ।

 

 

विशेष :- उड्डीयान बन्ध को सभी बन्धों ( उड्डीयान, जालन्धर व मूलबन्ध ) में श्रेष्ठ माना गया है । विद्यार्थियों के लिए यह उपयोगी जानकारी है । उड्डीयान बन्ध के सम्बंध में कुछ अन्य प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं । जैसे किस यौगिक क्रिया से पूर्व हमें उड्डीयान बन्ध का अभ्यास करना चाहिए ? जिसका उत्तर है नौलि क्रिया । उड्डीयान बन्ध में श्वास की स्थिति क्या होती है ? जिसका उत्तर है श्वास को बाहर निकाल कर बाहर ही रोककर अर्थात् बह्यवृत्ति प्राणायाम की स्थिति में उड्डीयान बन्ध का अभ्यास किया जाता है । इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि प्राण का रेचन करके हमें उड्डीयान बन्ध का अभ्यास करना चाहिए ।

जालन्धर बन्ध विधि व फल वर्णन

 

कण्ठ सङ्कोचनं कृत्वा चिबुकं हृदयेन्यसेत् ।

जालन्धर कृते बन्धे षोडशाधारबन्धनम् ।

जालन्धरमहामुद्रा मृत्योश्च क्षयकारिणी ।। 12 ।।

सिद्धं जालन्धरं बन्धं योगिनां सिद्धिदायकम् ।

षण्मासमभ्सद्यो यो हि स सिद्धो नात्र संशय: ।। 13 ।।

 

भावार्थ :- किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर अपने कण्ठ को सिकोड़कर ठुड्डी को छाती पर लगाने को जालन्धर बन्ध कहते हैं । यह शरीर में स्थित सभी सोलह आधारों को बन्ध करता है अर्थात् इसके करने से सभी आधारों में भी अपने आप ही बन्ध लग जाता है । जालन्धर बन्ध नामक श्रेष्ठ मुद्रा के अभ्यास से मृत्यु का भी नाश हो जाता है । यदि निरन्तर छ: महीने तक जालन्धर बन्ध का अभ्यास किया जाए तो यह साधक को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करता है । छ: महीने के अभ्यास से जालन्धर बन्ध सिद्ध हो जाता है । इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह अथवा शक नहीं है ।

 

 

विशेष :- जालन्धर बन्ध के सम्बंध में यह पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा अथवा बन्ध का अभ्यास करने से शरीर में स्थित सभी सोलह आधारों को बांधा अथवा स्थिर किया जा सकता है ? जिसका उत्तर जालन्धर बन्ध है । दूसरा यह भी पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा या बन्ध में सोलह आधारों का वर्णन किया गया है ? या पूछा जा सकता है कि जालन्धर बन्ध के अनुसार शरीर में कितने आधार माने गए हैं ? उत्तर है सोलह ( 16 ) । इसके अलावा यह भी पूछा जा सकता है कि जालन्धर बन्ध कितने समय में सिद्ध हो जाता है ? उत्तर है छ: महीने में । ऊपर वर्णित प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी हैं ।

 

 

मूलबन्ध विधि व फल वर्णन

 

पार्ष्णिना वामपादस्य योनिमाकुञ्चयेत्तत:

नाभिग्रन्थिं मेरुदण्डे सम्पीड्य यत्नतः सुधी: ।। 14 ।।

मेढ्रं दक्षिणगुल्फे तु दृढबन्धं समाचरेत् ।

जराविनाशिनी मुद्रा मूलबन्धो निगद्यते ।। 15 ।।

संसारसमुद्रं तर्त्तमभिलषति य: पुमान् ।

विरलेसुगुप्तो भूत्वा मुद्रामेनां समभ्यसेत् ।। 16 ।।

अभ्यासाद् बन्धनस्यास्य मरुत्सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ।

साधयेद् यत्नतो तर्हि मौनी तु विजितालस: ।। 17 ।।

 

भावार्थ :-  बुद्धिमान साधक पहले बायें पैर की एड़ी से योनिस्थान ( अंडकोशों के नीचे का स्थान ) को दबाते हुए अपने नाभि प्रदेश व मेरुदण्ड ( रीढ़ की हड्डी ) को प्रयत्नपूर्वक सीधा तानकर रखें । इसके बाद अपने दायें पैर की एड़ी से अपने लिङ्ग को अच्छी तरह से दबाकर रखें अर्थात् एड़ी को लिङ्ग के ऊपर स्थापित कर देना चाहिए । इस प्रकार यह मूलबन्ध नामक मुद्रा साधक के बुढ़ापे को खत्म करने वाली होती है । जो भी व्यक्ति इस जीवन रूपी समुन्द्र को पार करने की इच्छा रखता है, उसे कहीं एकांत स्थान पर जाकर स्थिर मन द्वारा इस मूलबन्ध मुद्रा का अच्छी प्रकार से अभ्यास करना चाहिए । इस मुद्रा के अभ्यास से साधक के सभी बन्धनों का नाश होता है और प्राण वायु की सिद्धि प्राप्त होती है । अतः योग साधक को मौन भाव से युक्त होकर आलस्य को पूरी तरह से त्यागते हुए इस भली- भाँति इस मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए ।

 

 

विशेष :- मूलबन्ध के अभ्यास से योगी को कभी बुढ़ापा नहीं आता व उसके सभी बन्धन समाप्त हो जाते हैं । साथ ही इसके अभ्यास से साधक संसार रूपी सागर को पार कर लेता है ।

महाबन्ध वर्णन

 

वामपादस्य गुल्फेन पायुमूलं निरोधयेत् ।

दक्षपादेन तद्गुल्फं संपीड्य यत्नतः सुधी: ।। 18 ।।

शनै: शनैश्चालयेत् पार्ष्णिं योनिमाकुञ्चयेच्छन:

जालन्धरे धारयेत् प्राणं महाबन्धो निगद्यते ।। 19 ।।

 

भावार्थ :-  बायें पैर की एड़ी से गुदामार्ग को दबाकर उसका निरोध करते हुए दायें पैर की एड़ी से योनिस्थान को प्रयास पूर्वक दबाएं । इसके बाद धीरे- धीरे से गुदास्थान व योनिस्थान का आकुंचन ( उसे सिकोड़ें ) करे । इसके साथ ही प्राणवायु को शरीर के अन्दर रोकते हुए जालन्धर बन्ध लगाएं । इस विधि को महाबन्ध कहा गया है ।

 

 

विशेष :-  ऊपर वर्णित महाबन्ध की विधि में मूलबन्ध व जालन्धर बन्ध की विधियाँ ही प्रयोग की गई हैं । उड्डीयान बन्ध का इसमें प्रयोग नहीं किया गया है ।

 

 

महाबन्ध फल

 

महाबन्ध: परो बन्धो जरामरणनाशन:

प्रसादादस्य बन्धस्य साधयेत् सर्ववाञ्छितम् ।। 20 ।।

 

भावार्थ :- महाबन्ध मुद्रा के अभ्यास से बुढ़ापा व मृत्यु का नाश होता है । महाबन्ध को सभी बन्धों में श्रेष्ठ माना गया है । इस मुद्रा के प्रभाव से साधक की सभी इच्छाएँ ( कामनाएँ ) पूर्ण होती हैं ।

 

 

विशेष :-  महाबन्ध मुद्रा मृत्यु व बुढ़ापा दोनों का नाश करता है । इसे केवल सभी बन्धों में श्रेष्ठ माना गया है न कि सभी मुद्राओं में । इससे साधक की सभी कामनाएँ भी पूर्ण होती हैं । यह सब परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी है ।

 

 

महावेध की उपयोगिता

 

रूपयौवनलावण्यं नारीणां पुरुषं विना ।

मूलबन्धमहाबन्धौ महावेधं विना तथा ।। 21 ।।

 

भावार्थ :- जिस प्रकार पुरुष के बिना नारी के रूप ( सुन्दर रंग ), यौवन ( जवानी ) व लावण्य ( मनमोहक सुंदरता ) का का कोई महत्त्व नहीं है अर्थात् पुरुष के बिना यह सब निरर्थक होता है । ठीक उसी प्रकार महावेध मुद्रा के बिना मूलबन्ध व महाबन्ध का कोई महत्त्व नहीं है अर्थात् महावेध के बिना मूलबन्ध व महाबन्ध का अभ्यास करना निरर्थक है ।

 

 

विशेष :- इस श्लोक में महावेध मुद्रा के महत्त्व को बताया गया है । परीक्षा की दृष्टि से यह पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा का अभ्यास किये बिना मूलबन्ध व महाबन्ध मुद्रा को निरर्थक अथवा फलहीन बताया गया है ? जिसका उत्तर है महावेध मुद्रा ।

 

 

महावेध मुद्रा विधि

 

महाबन्धं समासाद्य उड्डानकुम्भकं चरेत् ।

महावेध: समाख्यातो योगिनां सिद्धिदायक: ।। 22 ।।

 

भावार्थ :- पहले साधक महाबन्ध मुद्रा की स्थिति में बैठे इसके बाद उड्डीयान बन्ध को लगाते हुए कुम्भक ( प्राणवायु को बाहर रोकें ) का अभ्यास करें । इस प्रकार यह महावेध मुद्रा कहलाती है । जो योगियों को सिद्धि प्रदान करती है ।

 

 

विशेष :- महावेध मुद्रा में उड्डीयान बन्ध, जालन्धर बन्ध व मूलबन्ध तीनों बन्धों का प्रयोग किया जाता है । परीक्षा में इससे सम्बंधित प्रश्न पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा में तीनों बन्ध एक साथ लगाए जाते हैं ? जिसका उत्तर है महावेध मुद्रा ।

 

महावेध मुद्रा का फल

 

महाबन्धमूलबन्धौ महावेध समन्वितौ ।

प्रत्यहं कुरुते यस्तु स योगी योगवित्तम: ।। 23 ।।

न मृत्युतो भयं तस्य न जरा तस्य विद्यते ।

गोपनीय: प्रयत्नेन वेधायं योगिपुङ्गवै: ।। 24 ।।

 

भावार्थ :- जो योग साधक प्रतिदिन मूलबन्ध व महाबन्ध के साथ महावेध मुद्रा का अभ्यास करता है, वह योग का ज्ञानी अथवा श्रेष्ठ योगी कहलाता है । जिसे न तो कभी बुढ़ापा सताता है और न ही वह कभी मृत्यु से भयभीत होता है । तभी सभी श्रेष्ठ योगियों ने महावेध मुद्रा की विधि को प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखने की बात कही है ।

 

 

विशेष :- महावेध मुद्रा करने वाले योगी को श्रेष्ठ योगी माना गया है । इसके अलावा यह मुद्रा बुढ़ापा व मृत्यु के प्रभाव को खत्म कर देती है ।

खेचरी मुद्रा विधि

 

जिह्वाधो नाडीं सञ्छिन्नां रसनां चालयेत् सदा ।

दोहेयेन्नवनीतेन लौहयन्त्रेण कर्षयेत् ।। 25 ।।

एवं नित्यं समभ्यासाल्लम्बिका दीर्घतां व्रजेत् ।

यावद् गच्छेद् भ्रुवोर्मध्ये तदागच्छति खेचरी ।। 26 ।।

रसनां तालुमध्ये तु शनै: शनै: प्रवेशयेत् ।

कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा ।

भ्रुवोर्मध्ये गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ।। 27 ।।

 

भावार्थ :- जीभ के नीचे स्थित नाड़ी ( जो जीभ गले से जोड़ कर रखती है ) को हल्का सा काटकर सदा उसको चलाना चाहिए अर्थात् जीभ को पकड़कर उसे आगे व पीछे की ओर खींचना चाहिए । उसके बाद जीभ के ऊपर मक्खन लगाकर उसका दोहन ( जिस प्रकार गाय अथवा भैंस का दूध निकालते हुए उनके स्तनों को खींचते हैं ) करना चाहिए और फिर लोहे की चिमटी से जीभ को पकड़कर उसे आगे की तरफ खींचे । इस प्रकार का अभ्यास प्रतिदिन करने से साधक की जीभ लम्बी हो जाती है और वह दोनों भोहों ( आज्ञा चक्र ) तक पहुँच जाती है । जैसे ही साधक की जीभ दोनों भौहों के बीच तक पहुँच जाती है वैसे ही उसकी खेचरी सिद्ध होने लगती है । इसके बाद जीभ को धीरे- धीरे उलटते हुए ( उल्टी करके ) तालु प्रदेश ( गले के बीच में ) के पीछे स्थित छिद्र में उसको प्रविष्ट ( उसका प्रवेश ) करवाएं और दृष्टि को दोनों भौहों के बीच में स्थिर करें अर्थात् दोनों भौहों के बीच में देखें । इसे खेचरी मुद्रा कहा जाता है ।

 

 

विशेष :-  खेचरी मुद्रा सभी मुद्राओं में अपना प्रमुख स्थान रखती है । इसे करने के लिए साधक को काफी समय व धैर्य का पालन करना पड़ता है । साथ ही इसे किसी अनुभवी योगी से ही सीखा जा सकता है । खेचरी मुद्रा करते हुए जब जीभ का दोहन किया जाता है तब साधक को ताजे मक्खन का प्रयोग करना अनिवार्य होता है साथ ही उसे लोहे की किसी चिमटी से खींचना पड़ता है । क्योंकि मक्खन लगने के बाद जीभ को हाथ से नहीं खींचा जा सकता । यह कुछ उपयोगी जानकारी थी जिसके सम्बन्ध में पूछा जा सकता है ।

 

 

खेचरी मुद्रा का फल

 

न च मूर्च्छा क्षुधा तृष्णा नैवालस्यं प्रजायते ।

न च रोगो जरा मृत्युर्देवदेह: स जायते ।। 28 ।।

नाग्निना दह्यते गात्रं न शोषयति मारुत:

न देहं क्लेदयन्त्यापो दंशयेन्न भुजङ्गम: ।। 29 ।।

लावण्यं च भवेद् गात्रे समाधिर्जायते ध्रुवम् ।

कपालवक्त्र संयोगे रसना रसमाप्नुयात् ।। 30 ।।

नाना रस समुद् भूतमानन्दं च दिने दिने ।

आदौ लवणक्षारं च ततस्तिक्तं कषायकम् ।। 31 ।।

नवनीतं घृतं क्षीरं दधितक्रमधूनि च ।

द्राक्षारसं च पीयूषं जायते रसनोदकम् ।। 32 ।।

 

भावार्थ :- जो साधक खेचरी मुद्रा का अभ्यास करता है उसे न तो कभी मूर्च्छा ( अचेतन अवस्था ) आती है, न ही उसे भूख व प्यास परेशान करती है, न उसे कभी आलस्य आता है, न ही उसे कभी कोई रोग होता है, न ही वह कभी बूढ़ा होता है और न ही वह कभी मृत्यु को प्राप्त होता है । बल्कि उसका शरीर देवताओं के समान कान्तिमान हो जाता है ।

उसके शरीर को अग्नि जला नहीं सकती, वायु सुखा नहीं सकती, पानी उसे गीला नहीं कर पाता है और न ही साँप के काटने ( डसने ) का उस पर कोई प्रभाव होता है ।

उसका शरीर सदा कान्तिमान अर्थात् तेजयुक्त होता है । उसे निश्चित रूप से समाधि की प्राप्ति होती है । कपाल और मुहँ का संयोग अर्थात् कपाल व मुख में एकरूपता होने से उसकी जीभ को अनेक या सभी प्रकार के रसों की प्राप्ति हो जाती है ।

उसे दिन प्रतिदिन अनेक प्रकार के रसों का अनुभव होता रहता है । इस क्रम में सबसे पहले लवण ( नमकीन खाद्य पदार्थों जैसा स्वाद ) और क्षारीय ( जामुन, गाजर, नींबू आदि पदार्थों जैसा स्वाद ) उसके बाद तिक्त ( तीखे जैसे- मिर्च व मसालों जैसा स्वाद ) और कषाय ( कड़वे जैसे- करेला आदि खाद्य पदार्थों जैसा स्वाद ) रसों का अनुभव होता है ।

इनके बाद साधक को ताजे मक्खन, घी, दूध, दही, तक्र ( लस्सी ), शहद, अंगूरों का रस व उसके बाद अन्त में अमृत जैसे रसों का अनुभव अथवा उत्पत्ति होती है ।

 

 

विशेष :-  खेचरी मुद्रा के लाभों की सूची अत्यंत लम्बी है । इसके अलावा इसे मुख्य मुद्राओं में से एक माना गया है । अतः सभी विद्यार्थी इन सभी श्लोकों को ध्यानपूर्वक पढ़ें । परीक्षा की दृष्टि से यह अत्यंत उपयोगी हैं ।

विपरीतकरणी मुद्रा विधि

 

नाभिमूलेवसेत् सूर्यस्तालुमूले च चन्द्रमा:

अमृतं ग्रसते सूर्यस्ततो मृत्युवशो नर: ।। 33 ।।

ऊर्ध्वं च योजयेत् सूर्यञ्चन्द्रञ्च अध आनयेत् ।

विपरीतकरणी मुद्रासर्वतन्त्रेषु गोपिता ।। 34 ।।

भूमौ शिरश्च संस्थाप्य करयुग्मं समाहित:

उर्ध्वपाद: स्थिरो भूत्वा विपरीतकरी मता ।। 35 ।।

 

भावार्थ :- मनुष्य के शरीर में सूर्य नाभि के मूलभाग अर्थात् नाभि के बीच में निवास करता है और चन्द्रमा तालु प्रदेश अर्थात् गले में रहता है । चन्द्रमा से स्त्रावित ( बहने ) होने वाले रस का सूर्य द्वारा ग्रहण कर लेने से ही साधक की मृत्यु होती है ।

अपने सूर्य ( नाभि प्रदेश  ) को ऊपर की ओर व चन्द्रमा ( तालु प्रदेश ) को ( नीचे की ओर ले जाने को ही विपरीतकरणी मुद्रा कहा गया है । जो सभी तन्त्र के ग्रन्थों में गोपनीय अर्थात् जिसे तन्त्र विद्या के सभी ग्रन्थों में गुप्त रखने की बात कही गई है ।

इसके लिए साधक को एकाग्र होकर अपने सिर को दोनों हाथों के बीच में जमीन पर रखकर पैरों को ऊपर आकाश की ओर करके शरीर को उसी अवस्था में स्थिर कर देने को ही विपरीतकरणी मुद्रा माना गया है ।

 

 

विपरीतकरणी मुद्रा का फल

 

मुद्रां च साधयेन्नित्यं जरां मृत्युञ्च नाशयेत् ।

स सिद्ध: सर्वलोकेषु प्रलयेऽपि न सीदति ।। 36 ।।

 

भावार्थ :-  जो योगी विपरीत करणी मुद्रा की साधना को प्रतिदिन करता है । वह इसमें सिद्धि प्राप्त कर लेता है । जिससे वह सभी लोकों अर्थात् पूरे विश्व में सिद्ध पुरुष कहलाता है । उसके लिए बुढ़ापा और मृत्यु भी नष्ट हो जाते हैं । वह प्रलय अर्थात् सृष्टि के विनाश के समय भी दुःख का अनुभव नहीं करता ।

 

 

विशेष :- परीक्षा की दृष्टि से विपरीतकरणी मुद्रा के सम्बंध में निम्न प्रश्न पूछे जा सकते हैं । जैसे- विपरीतकरणी मुद्रा किस आसन से सम्बंधित मानी जाती है ? अथवा विपरीतकरणी मुद्रा में किस आसन की विधि अपनाई जाती है ? जिसका उत्तर है सर्वांगासन । शरीर में सूर्य का स्थान कहाँ पर है ? जिसका उत्तर है नाभि प्रदेश में । शरीर में चन्द्रमा का स्थान कहाँ पर स्थित है ? जिसका उत्तर है तालु प्रदेश में । शरीर में बहने वाले अमृत को किस मुद्रा द्वारा सुरक्षित रखा जा सकता है ? जिसका उत्तर है विपरीतकरणी मुद्रा द्वारा ।

योनिमुद्रा विधि वर्णन

 

सिद्धासनं समासाद्य कर्णचक्षुर्नसोमुखम् ।

अङ्गुष्ठतर्जनीमध्यानामादिभिश्च साधयेत् ।। 37 ।।

काकोभि: प्राणंसङ्कृष्य अपाने योजयेत्तत:

षट्चक्राणि क्रमाद् ध्यात्वा हुं हंसमनुना सुधी: ।। 38 ।।

चैतन्यमानयेद्धेवीं निद्रिता या भुजङ्गिनी ।

जीवेन सहितां शक्तिं समुत्थाप्य कराम्बुजे ।। 39 ।।

शक्तिमय: स्वयं भूत्वा परं शिवेन सङ्गमम् ।

नानासुखं विहारञ्च चिन्तयेत् परमं सुखम् ।। 40 ।।

शिवशक्ति समायोगादेकान्ते भुवि भावयेत् ।

आनन्दमानसो भूत्वा अहं ब्रह्मेति सम्भवेत् ।। 41 ।।

योनिमुद्रा परा गोप्या देवानामपि दुर्ल्लभा ।

सकृत्तु लाभसंसिद्धि: समाधिस्थ: स एव हि ।। 42 ।।

 

भावार्थ :-  योनिमुद्रा के लिए सिद्धासन में बैठकर अपने कानों, आँखों और मुहँ को अँगूठे, तर्जनी ( पहली अँगुली ), मध्यमा ( दूसरी अँगुली ) व अनामिका ( तीसरी अँगुली ) अँगुलियों से ढ़कना चाहिए ।

अब बुद्धिमान साधक काकीमुद्रा ( होठों को कौवे की चोंच के समान बनाकर ) से प्राणवायु को अन्दर भरकर उसे अपान वायु में मिला दें । इसके बाद साधक हुं और हंस मन्त्रों के द्वारा अपने शरीर में स्थित षट्चक्रों ( मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि व आज्ञा चक्र ) पर ध्यान करते हुए उस सोई हुई भुजंगिनी अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने का काम करें और उस जीवंत शक्ति ( कुण्डलिनी ) को ऊपर की ओर उठाते हुए अपने अधीन करने का प्रयास करें ।

इस प्रकार कुण्डलिनी शक्ति को ऊपर की ओर उठाने से साधक स्वयं को शक्तिमान मानकर परम शक्तिमान भगवान शिव के साथ संयोग करके अनेक प्रकार के सुखों के साथ निवास करते हुए परम आनन्द का अनुभव करता है ।

साधक को शिव और शक्ति के मिलन से पृथ्वी पर ही एकान्त में रहते हुए स्वयं को ब्रह्मा का अंश मानते हुए या स्वयं को ही ब्रह्मा मानते हुए परमानन्द की भावना ( अनुभूति ) करनी चाहिए ।

योनिमुद्रा को भी अन्य मुद्राओं की भाँति ही अत्यंत गोपनीय माना गया है । इसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ ( कठिनता से प्राप्त होने वाली ) माना गया है । योनिमुद्रा में एक बार भी सिद्धि प्राप्त होने से साधक को समाधि अथवा मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है ।

 

 

विशेष :- योनिमुद्रा के सम्बंध में पूछा जा सकता है कि योनिमुद्रा में किस एक अन्य मुद्रा की विधि का भी प्रयोग किया जाता है ? जिसका उत्तर है काकीमुद्रा । इसके अलावा यह भी पूछा जा सकता है कि योनिमुद्रा में किन मन्त्रों द्वारा चक्रों का ध्यान करने की बात कही गई है ? जिसका उत्तर है हुं और हंस मन्त्रों द्वारा ।

 

 

योनिमुद्रा का फल

 

ब्रह्महा भ्रूणहाचैव सुरापी गुरुतल्पग:

एतै: पापैर्न लिप्येत योनिमुद्रानिबन्धनात् ।। 43 ।।

यानि पापानि घोराणि उपपापानि यानि च ।

तानि सर्वाणि नश्यन्ति योनिमुद्रानिबन्धनात् ।

तस्मादभ्यासनं कुर्याद्यदि मुक्तिं समिच्छति ।। 44 ।।

 

भावार्थ :- योनिमुद्रा का अभ्यास करने से साधक ब्रह्महत्या, गर्भपात, मदिरापान ( शराब का सेवन करने वाला ), गुरु की पत्नी के साथ सम्भोग आदि इन सभी पापों से मुक्त हो जाता है अर्थात् उसकी इन सभी पापों किसी भी प्रकार की लिप्तता ( भागीदारी ) नहीं रहती है ।

इसके अतिरिक्त जो भी घोर पाप ( घृणित या बड़े ) या सामान्य श्रेणी के पाप होते हैं । योनिमुद्रा के अभ्यास से वह सभी पाप नष्ट ( प्रभावहीन ) हो जाते हैं । अतः मुक्ति की इच्छा अथवा अभिलाषा रखने वाले साधक को योनिमुद्रा का अभ्यास करना चाहिए ।

 

 

विशेष :-  इस श्लोक में कहा गया है कि योनिमुद्रा का अभ्यास करने वाला साधक ऊपर वर्णित सभी घृणित व सामान्य पापों से मुक्त हो जाता है । इसके अर्थ को समझने में कुछ व्यक्ति गलती कर बैठते हैं । उनका मानना है कि किसी व्यक्ति ने पूर्व में ऊपर वर्णित पाप किये हों और यदि अब वह योनिमुद्रा का अभ्यास करता है तो वह उन सभी पापों से मुक्त हो जाएगा । लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है । जिस व्यक्ति ने जितने बुरे अथवा अच्छे कर्म किये हैं । उन सभी का फल उसको निश्चित रूप से मिलता है । यहाँ पर ग्रन्थकार का कहना है कि जो साधक नियमित रूप से योनिमुद्रा का अभ्यास करता है । वह ऊपर वर्णित पापों का भागीदार नहीं बनता है । वह उनसे सदा बचा रहता है । यहाँ पर पाप कर्मों से बचने की बात कही गई है न कि पाप कर्मों के फल से मुक्त होने की । जब साधक योनिमुद्रा के अभ्यास में अग्रसर रहता है तो वह इस प्रकार के घृणित कर्म करता ही नहीं है । वह सदैव इनसे दूर रहता है । तभी कहा गया है कि उसकी इन पाप कर्मों में किसी तरह की कोई लिप्तता नहीं होती ।

अतः सभी विद्यार्थी इस श्लोक के इस वास्तविक अर्थ को समझने का प्रयास करें । साथ ही इसमें बताये गए सभी पाप कर्मों को भी याद करलें । यह परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी हैं ।

 

वज्रोणि अथवा वज्रोली मुद्रा विधि

 

धरामवष्टभ्य करयोस्तालाभ्यामूर्ध्वं क्षिपेत्यादयुगं शिर: खे ।

शक्तिप्रबोधाय चिरजीवनाय वज्रोणिमुद्रां मुनयो वदन्ति ।। 45 ।।

 

भावार्थ :- दोनों हाथों को जमीन पर रखकर दोनों पैरों व सिर को ऊपर आकाश की ओर उठाएं । शक्ति को जगाने के लिए व दीर्घायु ( लम्बी आयु ) प्राप्त करने के लिए योगियों ने वज्रोली मुद्रा का अभ्यास करने की बात कही है ।

 

 

वज्रोली मुद्रा का फल

 

अयं योगो योगश्रेष्ठो योगिनां मुक्तिकारकम् ।

अयं हितप्रदो योगो योगिनां सिद्धिदायक: ।। 46 ।।

एतद्योगप्रसादेन बिन्दुसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ।

सिद्धे बिन्दौ महायत्ने किं न सिद्धयतिभूतले ।। 47 ।।

भोगेन महता युक्तो यदि मुद्रां समाचरेत् ।

तथापि सकला सिद्धिस्तस्य भवति निश्चिततम् ।। 48 ।।

 

भावार्थ :- वज्रोली मुद्रा योग साधनाओं में श्रेष्ठ बताई गई है । इसके अभ्यास से योगियों को मुक्ति प्राप्त होती है । साथ ही यह मुद्रा योगियों के लिए हितकारी व सिद्धि प्रदान करने वाली है ।

इस मुद्रा के अभ्यास से साधक को निश्चित रूप से वीर्य की सिद्धि प्राप्त होती है और वीर्य की सिद्धि प्राप्त होने से इस पृथ्वी पर कौन सा ऐसा कार्य है जिसे साधक पूरा नहीं कर सकता ? अर्थात् वीर्य की सिद्धि प्राप्त होने से साधक के लिए इस पृथ्वी पर कोई भी कार्य असम्भव नहीं है ।

यदि विषय- भोगों में पड़ा हुआ व्यक्ति भी वज्रोली मुद्रा का अभ्यास करता है तो उसे भी निश्चित रूप से सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ।

 

 

विशेष :- वज्रोली मुद्रा से साधक को किस सिद्धि की प्राप्ति होती है ? जिसका उत्तर है वीर्य सिद्धि । यह उपयोगी प्रश्न हो सकता है ।

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Dr. Balavant Singh