बुधवार, 27 मार्च 2024

स्वर-विज्ञान

 

स्वर-विज्ञान और बिना औषध रोगनाशके उपाय

विशअवपिता विधाताने मनुष्यके जन्मके समयमं ही देहके साथ एक ऐसा आईश्चर्यजनक कौशलपूर्ण अपूर्व उपाय रच दिया है जिसे जान लेने पर सांसारिक, वैषयिक किसी भी कार्यमें असफलताका दुःख नहीं हो सकता । हम इस अपूर्व कौशलको नहीं जानते, इसी कारण हमारा कार्य असफल हो जाता है, आशा भंग हो जाती हैं, ह्में मनस्ताप और रोग भोगना पडता है। यह विषय जिस शास्त्रमें है, उसे स्वरोदय-शास्त्र कहते हैं। यह स्वरशास्त्र जैसा दुर्लभ है , स्वरज्ञ गुरुका भी उतना ही अभाव है। स्वरशास्त्र प्रत्यक्ष फल देनेवाला है। मुझे पद-पदपर इसका प्रत्यक्ष फल देखकर आश्चर्यचकित होना पडा है। समग्र स्वरशास्त्रको ठीक-ठीक लिपिबद्ध करना बिलकुल असम्भव है। केवल साधकोंके कामकी कुछ बाते  यहाँ संक्षेपमें दी जा रही हैं।

स्वरशास्त्र सीखनेके लिये श्वास-प्रश्वासकी गति के सम्बन्धमें सम्यक् ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है।

      कायानगरमध्ये तु मारुतः क्षितिपालकः

देहरूपी नगर में वायु राजाके समान है। प्राणवायु निःश्वास और प्रश्वास इन दो नामोंसे पुकारा जाता है। वायु ग्रहण करनेका नाम निःश्वास और वायुक परित्याग को प्रश्वास है। जीवके जन्मसे मृत्युके अन्तिम क्षणतक निरन्तर श्वास-प्रश्वासकी क्रिया होती रहती है। औऱ यह निःश्वास नासिकाके दोनों छेदोंसे एक ही समय एक साथ समानरूपसे नहीं चला करता, कभी बायें और की दाहिने पुटसे चलता है। कभी-कभी एकाध घडीतक एक ही समय दोनों नोकोंसे समानभावसे श्वास प्रवाहित होता है। बायें नासापुटके श्वासको इडामें चलना, दाहिनी नासिकाके श्वासको पिंगलामें चलना और दोनों पुटोंसे एक समान चलनेपर उसे सुषुम्नामें चलना कहते हैं। एक नासापुटको दबाकर दूसरेके द्वारार श्वासको बाहर निकालनेपर यह साफउ मालूम हो जाता हैं कि एक नासिका से सरलतापूर्वक श्वास-प्रवाह चल रहा हैं, और दूसरा नासापुट मानो बन्द है, अर्थात् उससे दूसरी नासिकाकी तरह सरलतापूर्वक श्वास बाहर नहीं निकलता। जिस नासिकासे सरलतापूर्वक श्वास बाहर निकलता हो , उस समय उसी नासिकाका श्वास कहना चायिये। किस नासिका से श्वास बाहर निकल रहा है, इसको पाठक उपर्युक्त प्रकारसे समझ सकते हैं। क्रमशः अभऊयास रहोनेपर बहुत आसानीसे मावलूम होने लगता हें कि किस नासिका से निःश्वास प्रवाहित होता है। प्रतिदिन प्रातः काल सूर्योदयके समयसे ढाई-ढाई घ़डीके हिसाबसे एक-एक नासिकासे श्वास चलता है। इस प्रकार रात-दिनमें बारह बार बायीं और बारह बार दाहिनी नासिकासे क्रमानुसार श्वास चलता है। किस दिन किस नासिका से पहले श्वास-क्रिया होती है, इसका एक निर्दिष्ट नियम है। यथा-

        आदौ चन्द्रः सिते पक्षे भास्करस्तु सितेतरे

        प्रतिपत्तौ दिनान्याहुस्त्रीणि  त्रीणि क्रमोदये।।(पवनविजयस्वरोदय)

 

कोई टिप्पणी नहीं:

Dr. Balavant Singh